सिद्धार्थनगर में सपा कैसे पलट रही भाजपा का समीकरण, पत्रकारों ने बता दिया सभी सीटों का हाल
उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर 2027 चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज है. जानिए 2022 के नतीजे, भाजपा-सपा के समीकरण, जातिगत गणित, संभावित उम्मीदवार, महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय मुद्दों का चुनाव पर संभावित असर.
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उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में 2027 के विधानसभा चुनावों की हलचल तेज हो गई है. नेपाल सीमा से सटे सिद्धार्थ नगर जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर सियासी सरगर्मी अपने चरम पर है. साल 2022 के चुनाव में यहां मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा था जहां भारतीय जनता पार्टी (NDA) के खाते में 3 सीटें गईं थीं. जबकि 2 सीटें समाजवादी पार्टी (SP) के पास थीं. आगामी 2027 के रण से पहले जिले के राजनीतिक हालात, जनता के मूड, स्थानीय मुद्दों और संभावित समीकरणों को लेकर वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों ने अलग-अलग राय रखी है. टिकट बंटवारे, जातिगत समीकरण और मुद्दों की इस रेस में इस बार मुकाबला काफी कांटे का माना जा रहा है.
जिले की पांचों विधानसभा सीटों का वर्तमान राजनीतिक ढांचा
वर्तमान में यहां से अपना दल (एस) के प्रत्याशी विनय वर्मा विधायक हैं. यह क्षेत्र कुर्मी बाहुल्य माना जाता है जहां चुनाव के वक्त अक्सर ध्रुवीकरण और स्थानीय मुद्दों की चर्चा रहती है.
कपिलवस्तु (विधानसभा 303 - सुरक्षित सीट): यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है जहां से वर्तमान में बीजेपी के श्याम धनी राही विधायक हैं. विपक्षी दल यहां मजबूत चेहरे की तलाश में हैं.
बांसी (विधानसभा 304): इस सीट पर बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री जयप्रताप सिंह का प्रभाव है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह सीट बीजेपी के लिए जिले की सबसे सेफ सीटों में मानी जाती है.
इटवा (विधानसभा 305): उत्तर प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष और दिग्गज सपा नेता माता प्रसाद पांडे यहां से विधायक हैं. मजबूत पकड़ के चलते यह सीट सपा का गढ़ मानी जाती है.
डुमरियागंज (विधानसभा 306): यह सीट हमेशा से हाई-प्रोफाइल और बायपोलर (ध्रुवीकरण आधारित) चुनाव के लिए जानी जाती है. वर्तमान में यहां से सपा की सैयदा खातून विधायक हैं जिन्होंने बेहद कम अंतर से पिछला चुनाव जीता था.
पत्रकारों और विश्लेषकों का आकलन: कांटे की टक्कर के आसार
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि जिले में इस बार सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कड़ा संघर्ष देखने को मिल सकता है. कई सीटों पर विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी रुझान) भी चर्चा में है.
विश्लेषकों का कहना है कि दोनों प्रमुख दलों (भाजपा और सपा) द्वारा मैदान में उतारे जाने वाले प्रत्याशियों के चेहरे और उनकी साख ही हार-जीत का बड़ा फैसला करेंगे. कई सीटों पर अभी से नए दावेदार ताल ठोक रहे हैं.
प्रमुख सीटों के खास समीकरण और चुनौतियां
डुमरियागंज विधानसभा का चुनाव हमेशा से वैचारिक और धार्मिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूमता रहा है. पूर्व विधायक राघवेंद्र प्रताप सिंह और सपा विधायक सैयदा खातून के बीच कड़ा मुकाबला रहता है. इसके अलावा अन्य दलों की सुगबुगाहट से यहां मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है.
इटवा में माता प्रसाद पांडे की मजबूत पकड़ के बावजूद भाजपा खेमे में भीतरखाने चल रही सुगबुगाहट और नए समीकरणों पर सबकी नजर है. वहीं बांसी में संगठनात्मक मजबूती के चलते भाजपा की स्थिति मजबूत आंकी जा रही है.
इस बार के बड़े चुनावी मुद्दे: महंगाई, बेरोजगारी और युवाओं का रुख
जमीनी चर्चाओं के मुताबिक, आम जनता के बीच महंगाई और युवाओं के लिए रोजगार एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. पत्रकारों का यह भी मानना है कि इस बार के चुनाव में युवा मतदाता और नई पीढ़ी पारंपरिक दावों से आगे बढ़कर विकास, शिक्षा और रोजगार के मुद्दों पर अधिक मुखर हो सकती है जिसका असर मतदान प्रतिशत और नतीजों पर पड़ सकता है.
