Opinion: जेपीएनआईसी को संजीवनी पर हायतौबा क्यों? विरासत, सियासत और निजी संचालन के बीच क्या है पूरा मामला?
भारतीय राजनीति में यह अजीबोगरीब परंपरा रही है कि जब भी किसी महापुरुष का नाम किसी संस्था, सड़क या किसी बड़े भवन से जुड़ता है तो राजनीतिक दल उसे अपनी विचारधारा से जोड़ने में जुट जाते हैं या फिर अपनी विचारधारा की मुहर लगाने की कोशिश करने लगते हैं. यह सोच ही मूल रूप से ग़लत है.
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Opinion: भारतीय राजनीति में यह अजीबोगरीब परंपरा रही है कि जब भी किसी महापुरुष का नाम किसी संस्था, सड़क या किसी बड़े भवन से जुड़ता है तो राजनीतिक दल उसे अपनी विचारधारा से जोड़ने में जुट जाते हैं या फिर अपनी विचारधारा की मुहर लगाने की कोशिश करने लगते हैं. यह सोच ही मूल रूप से ग़लत है. महात्मा गांधी, सरदार पटेल, डॉ. आंबेडकर, पं. दीनदयाल उपाध्याय या जय प्रकाश नारायण, पूरे राष्ट्र के साझा गौरव हैं. इसलिए अब यदि लोक नायक जय प्रकाश नारायण के नाम पर लखनऊ में बने इंटरनेशनल सेंटर (JPNIC) को क्रियाशील करने की प्रक्रिया शुरू हुई तो इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने के बजाय राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में देखा जाना चाहिए. लोकनायक का असली सम्मान तब होगा जब वह भवन जीवंत अवस्था में आए, उसमें सम्मेलन हो, लोग आएं-जाएं, राष्ट्रीय विमर्श और सांस्कृतिक गतिविधियां वहां दिखाई दें. उनका सम्मान वहां किसी राजनीतिक दल का झंडा फहराने से नहीं है. जय प्रकाश नारायण के नाम को राजनीतिक बंधक नही बनाया जा सकता. ऐसी चेष्टा भी अपराध है.

