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हिंदू-मुस्लिम शादी को लेकर कुरान में क्या लिखा है? मुफ्ती शहाबुद्दीन के फतवे के बाद ये 3 आयतें और भारतीय कानून समझिए

उमर अब्दुल्ला और पत्रकार निधि राजदान की शादी पर मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी के फतवे के बाद अंतरधार्मिक विवाह को लेकर चर्चा शुरू हो गई है. कुरान की सूरह अल-बकरा, अल-मायदा और अल-मुम्तहिना की आयतों में अलग-अलग धर्मों के लोगों की शादी को लेकर क्या निर्देश हैं? आइए समझें...

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जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पत्रकार निधि राजदान की शादी को लेकर धार्मिक बहस छिड़ गई है. ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इस शादी को इस्लाम की नजर में नाजायज बताते हुए फतवा जारी किया है. उनका कहना है कि उमर अब्दुल्ला मुस्लिम हैं, जबकि निधि राजदान गैर-मुस्लिम हैं, इसलिए निकाह से पहले निधि को इस्लाम कबूल करना चाहिए था.

मौलाना के इस बयान के बाद हिंदू और मुस्लिम के बीच शादी को लेकर कुरान की आयतों और भारतीय संविधान के प्रावधानों की चर्चा हो रही है. सवाल है कि क्या कुरान में दूसरे धर्म में शादी करने पर रोक है? क्या मुस्लिम पुरुष हिंदू महिला से शादी कर सकता है? क्या मुस्लिम महिला किसी हिंदू पुरुष से विवाह कर सकती है? और भारतीय कानून इस बारे में क्या कहता है?

इन सवालों को समझने के लिए कुरान की तीन आयतों और भारतीय संविधान के साथ-साथ स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 को समझना जरूरी है.

कुरान में दूसरी आस्था में शादी को लेकर क्या लिखा है?

कुरान में शादी और अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं वाले लोगों के विवाह को लेकर कुछ स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं. इनमें सूरह अल-बकरा की आयत 221, सूरह अल-मायदा की आयत 5 और सूरह अल-मुम्तहिना की आयत 10 का विशेष उल्लेख किया जाता है.

1. सूरह अल-बकरा, आयत 221: मुशरिक पुरुष और महिलाओं से शादी का जिक्र

कुरान की सूरह अल-बकरा की आयत 221 में मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं को मुशरिक यानी बहुदेववादी लोगों से शादी करने से रोका गया है, जब तक वे ईमान न ले आएं.

इस आयत में मुस्लिम पुरुषों को मुशरिक महिलाओं से और मुस्लिम महिलाओं को मुशरिक पुरुषों से विवाह न करने की बात कही गई है. कहा गया है कि ईमान वाली महिला या पुरुष, मुशरिक व्यक्ति से बेहतर हैं, भले ही दूसरा व्यक्ति आकर्षक क्यों न लगे. यहां एक बात समझना जरूरी है कि आयत में हिंदू धर्म का नाम लेकर अलग से उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन मूर्तिपूजक का जिक्र है.

2. सूरह अल-मायदा, आयत 5: यहूदियों और ईसाइयों की महिलाओं से शादी की अनुमति

कुरान की सूरह अल-मायदा की आयत 5 में मुस्लिम पुरुषों को एक विशेष छूट दी गई है. इसमें कहा गया है कि मुस्लिम पुरुष पाक-साफ चरित्र वाली मुस्लिम महिलाओं के साथ उन महिलाओं से भी विवाह कर सकते हैं, जो अहल-ए-किताब हैं. इसका अर्थ यहूदियों और ईसाइयों की महिलाओं से लगाया जाता है. 

इस आयत में विवाह के लिए मेहर देने और वैवाहिक संबंध को उचित तरीके से निभाने की शर्त भी बताई गई है. कुरान की इस आयत में मुस्लिम पुरुषों को यहूदी और ईसाई महिलाओं से विवाह की अनुमति मिलती है, लेकिन इसमें हिंदू महिलाओं का स्पष्ट उल्लेख नहीं है. 

3. सूरह अल-मुम्तहिना, आयत 10: मुस्लिम महिलाओं और गैर-मुस्लिम पुरुषों के विवाह का सवाल

कुरान की सूरह अल-मुम्तहिना की आयत 10 में कहा गया है कि ईमान वाली महिलाएं गैर-मुस्लिम पुरुषों के लिए वैध पत्नियां नहीं हैं और न ही गैर-मुस्लिम पुरुष उनके लिए वैध पति हैं. इसमें गैर-मुस्लिम पतियों के साथ वैवाहिक संबंध बनाए रखने को लेकर भी निर्देश दिया गया है.

इस आयत के आधार पर पारंपरिक इस्लामी कानून में मुस्लिम महिला का गैर-मुस्लिम पुरुष से विवाह जायज नहीं माना जाता. 

क्या मुस्लिम पुरुष हिंदू महिला से शादी कर सकता है?

इस सवाल का जवाब देते समय कुरान की आयतों और इस्लामी कानून की पारंपरिक व्याख्या को अलग-अलग समझना होगा.

इस्लामी कानून की पारंपरिक व्याख्या में मुस्लिम पुरुष को यहूदी और ईसाई महिला से शादी की अनुमति दी गई है, क्योंकि उन्हें अहल-ए-किताब माना जाता है. लेकिन हिंदू धर्म को इस श्रेणी में नहीं रखा जाता इसलिए पारंपरिक इस्लामी फिकह के अनुसार मुस्लिम पुरुष और हिंदू महिला का निकाह जायज नहीं माना जाता, जब तक महिला इस्लाम कबूल न कर ले.

दूसरी ओर, मुस्लिम महिला और हिंदू पुरुष के विवाह को भी पारंपरिक इस्लामी फिकह में मान्यता नहीं दी जाती. इसके लिए सूरह अल-बकरा की आयत 221 और सूरह अल-मुम्तहिना की आयत 10 का हवाला दिया जाता है.

भारतीय संविधान में हिंदू-मुस्लिम शादी को लेकर क्या प्रावधान हैं?

भारत में दो अलग-अलग धर्मों के बालिग व्यक्ति शादी करना चाहते हैं तो उनके लिए कानून में रास्ता मौजूद है. भारतीय संविधान नागरिकों को समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक आजादी का अधिकार देता है. अंतरधार्मिक विवाह के लिए सबसे सीधा कानूनी प्रावधान स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 में है.

स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 क्या है, जिसके तहत हो सकती है हिंदू-मुस्लिम शादी?

भारत में अलग-अलग धर्मों के लोगों की शादी के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 बनाया गया है. कानून ऐसे विवाह की सुविधा देता है जिसमें दोनों पक्षों का धर्म अलग-अलग हो और वे धर्म परिवर्तन किए बिना शादी करना चाहते हों.

इस कानून की धारा 4 में शादी की प्रमुख शर्तें बताई गई हैं.

  • शादी के समय दोनों में से किसी का पहले से जीवित पति या पत्नी नहीं होना चाहिए.
  • दोनों पक्ष शादी के लिए कानूनी रूप से सहमति देने में सक्षम हों.
  • पुरुष की उम्र कम से कम 21 साल और महिला की उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए.

शादी के लिए क्या प्रक्रिया अपनानी होती है?

स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 5 के अनुसार, शादी करने वाले दोनों लोगों को संबंधित जिले के मैरिज ऑफिसर को लिखित नोटिस देना होता है. इसके लिए कम से कम एक पक्ष का उस जिले में नोटिस देने से पहले लगातार 30 दिन तक रहना जरूरी है.

धारा 6 के तहत मैरिज ऑफिसर इस नोटिस को अपने कार्यालय में निर्धारित तरीके से प्रकाशित करता है. धारा 7 के मुताबिक, नोटिस प्रकाशित होने के बाद 30 दिन तक कानून में बताई गई शर्तों के उल्लंघन के आधार पर आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है. अगर कोई वैध आपत्ति नहीं आती और बाकी कानूनी शर्तें पूरी हैं तो विवाह संपन्न कराया जा सकता है. 

सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है- जीवनसाथी चुनना व्यक्ति का अधिकार

मामला 2018 का है. इसे शफीन जहां बनाम अशोकन केएम (Shafin Jahan vs Asokan K.M.) के नाम से जाना जाता है. इस मामले में हादिया नाम की महिला ने इस्लाम कबूल करने के बाद शफीन जहां से शादी की थी. महिला के पिता ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. हाईकोर्ट ने उनकी शादी रद्द कर दी थी.

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 8 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि अपना जीवनसाथी चुनना व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है. धर्म और शादी से जुड़े फैसले व्यक्ति की अपनी पसंद के दायरे में आते हैं. न तो राज्य और न ही कानून किसी व्यक्ति को बता सकता है कि उसे किससे शादी करनी चाहिए. 

क्या किसी मौलाना का फतवा शादी को अमान्य कर सकता है?

उमर अब्दुल्ला और निधि राजदान की शादी पर मौलाना शहाबुद्दीन रजवी का बयान भी इसी अंतर को समझने का मौका देता है. फतवा किसी इस्लामी विद्वान या मुफ्ती की ओर से धार्मिक सवाल पर दी गई राय या धार्मिक व्याख्या होती है. किसी अदालत का फैसला या सरकारी आदेश नहीं होता.

किसी मौलाना की ओर से किसी शादी को शरीयत के खिलाफ बताने भर से भारतीय कानून के तहत उस शादी की वैधता खत्म नहीं हो जाती. शादी कानूनी रूप से मान्य है या नहीं, इस बात पर निर्भर करेगा कि विवाह किस कानून के तहत हुआ है और उसकी जरूरी शर्तें पूरी हुई हैं या नहीं.

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