Rampur Khas Assembly:1980 से लेकर आज तक रामपुर खास की जनता ने तिवारी परिवार के अलावा किसी और को विधानसभा नहीं भेजा. प्रमोद तिवारी ने लगातार 9 बार चुनाव जीतने के बाद अपनी राजनीतिक विरासत बेटी आराधना मिश्रा 'मोना' को सौंपी. हालांकि पिछले दो चुनावों के आंकड़ों ने बीजेपी को एक नई उम्मीद दी है क्योंकि जीत का अंतर लगातार कम हो रहा है. आइए समझते हैं इस 'खास' सीट का सियासी गुणा-भाग.
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जीत का समीकरण और चुनौतियां
कांग्रेस के जिला अध्यक्ष के मुताबिक, रामपुर खास में विकास ही प्रमोद तिवारी की ताकत है.सड़क, बिजली, पानी, ट्रामा सेंटर और स्कूलों का जाल बिछाकर तिवारी परिवार ने इसे शिक्षा का हब बना दिया है. अगर 2027 में भी आराधना मिश्रा जीतती हैं तो कांग्रेस यहां लगातार 50 साल की जीत का एक नया वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने का जश्न मनाएगी.
बीजेपी की बढ़ती उम्मीदें और 'छोटे सरकार' की टक्कर
बीजेपी के लिए यहा नागेश प्रताप सिंह उर्फ 'छोटे सरकार' उम्मीद की किरण बने हुए हैं. 2017 और 2022 के चुनावों में बीजेपी ने आराधना मिश्रा को कड़ी टक्कर दी और जीत के अंतर को काफी कम कर दिया है. बीजेपी का दावा है कि जनता अब बदलाव चाहती है और 2027 में यहां निश्चित रूप से कमल खिलेगा.
जातिगत गणित और सपा का 'अदृश्य' समर्थन
रामपुर खास का चुनावी गणित काफी रोचक है. यहां करीब 3.15 लाख वोटर हैं जिनमें दलित (75,000), मुसलमान (55,000), यादव (50,000) और ब्राह्मण (40,000) निर्णायक भूमिका में हैं. प्रमोद तिवारी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यहां समाजवादी पार्टी उनके खिलाफ अपना प्रत्याशी नहीं उतारती जिससे विपक्षी वोट बंटने के बजाय सीधे कांग्रेस के पाले में चले जाते हैं.
क्या 2027 में होगा परिवर्तन?
स्थानीय पत्रकारों का मानना है कि प्रमोद तिवारी और उनकी बेटी आराधना मिश्रा की सक्रियता उन्हें मजबूत रखती है. लेकिन अगर बीजेपी अपनी रणनीति में बदलाव करती है और सपा का साथ कांग्रेस को नहीं मिलता तो यहां मुकाबला और भी दिलचस्प हो सकता है. फिलहाल रामपुर खास की जनता 2027 के फैसले का इंतजार कर रही है.
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