लोकसभा में जब समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव सदन के भीतर प्रवेश करते हैं, तो उनके साथ सांसदों का एक बड़ा हुजूम नजर आता है. इस हुजूम में एक चेहरा ऐसा है जो साये की तरह अखिलेश यादव के साथ रहता है और उनके बैकबोन (रीढ़ की हड्डी) के रूप में खड़ा नजर आता है. सदन में कोई अखिलेश यादव को टोके या उनसे उलझे, तो यह शख्स सबसे पहले ढाल बनकर सामने आता है. हम बात कर रहे हैं सपा के कद्दावर नेता और आजमगढ़ से सांसद धर्मेंद्र यादव की.
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हाल ही में संसद के भीतर धर्मेंद्र यादव के तेवर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी दिलचस्प बहस ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है. आइए जानते हैं धर्मेंद्र यादव की कहानी और उनके इस बेबाक अंदाज के पीछे का सफर.
संसद में पीएम मोदी से सीधे भिड़ गए धर्मेंद्र यादव
लोकसभा में परिसीमन बिल पर चर्चा चल रही थी. धर्मेंद्र यादव ने सपा की ओर से मोर्चा संभालते हुए आरोप लगाया कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों के हक की अनदेखी हो रही है. चर्चा के दौरान जब सत्ता पक्ष की ओर से टोका-टाकी हुई, तो अखिलेश यादव अपने भाई के समर्थन में खड़े हो गए.
बात तब और बढ़ गई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में जवाब देना शुरू किया और यादव परिवार का जिक्र किया. इस पर धर्मेंद्र यादव ने तुरंत खड़े होकर सीधे प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए कहा, "प्रधानमंत्री जी, आप खुद पिछड़े समुदाय से आते हैं, इसके बावजूद आप पिछड़ों के साथ ऐसा (अन्याय) कर रहे हैं." प्रधानमंत्री ने भी इस पर मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "धर्मेंद्र जी, मैं आपका बहुत आभारी हूं कि आपने मेरी पहचान करा दी. यह बात सही है, मैं अति पिछड़े समाज से आता हूं. और अखिलेश जी मेरे मित्र हैं, तो कभी-कभी मदद कर देते हैं."
भाई के लिए 'सॉफ्ट' तो विरोधियों के लिए 'सख्त'
धर्मेंद्र यादव का यह तेवर पहली बार नहीं दिखा है. सदन में जब भी कोई विपक्षी सदस्य अखिलेश यादव को बीच में रोकता है, तो धर्मेंद्र यादव बड़ी कड़ाई से उन्हें शांत करा देते हैं. उनकी इसी आक्रामक और वफादार छवि के कारण उन्हें सपा का मुख्य रणनीतिकार और 'बैकबोन' माना जाता है. वे सिर्फ भाई नहीं, बल्कि पार्टी के चीफ व्हिप की तरह भी भूमिका निभाते हैं यह तय करते हैं कि कौन, कितना और किस विषय पर बोलेगा.
कौन हैं धर्मेंद्र यादव?
धर्मेंद्र यादव, अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं (मुलायम सिंह यादव के भाई अभय राम यादव के बेटे). जब यादव परिवार दो हिस्सों में बंटा, तब भी धर्मेंद्र मजबूती से अखिलेश के साथ खड़े रहे. यहां तक कि जब उनकी अपनी बहन ने भाजपा का दामन थामा, तब धर्मेंद्र ने स्पष्ट किया कि जो सपा के साथ नहीं, उसका उनसे कोई संबंध नहीं. उनकी राजनीति की नींव इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पड़ी. छात्र राजनीति के दौरान ही उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवा लिया था.
मुलायम सिंह और वो ऐतिहासिक 'शपथ' वाला दिन
धर्मेंद्र यादव का कद मुलायम सिंह यादव की नजर में कितना बड़ा था, इसका अंदाजा एक पुराने किस्से से लगता है. साल 2003 में जब यूपी में छात्र संघ चुनावों पर पाबंदी थी, तब धर्मेंद्र ने मुलायम सिंह से वादा लिया था कि वे छात्रों के आंदोलन में शामिल होने इलाहाबाद आएंगे. 29 अगस्त की तारीख तय थी, लेकिन संयोग से उसी दिन मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी थी.
धर्मेंद्र बताते हैं कि नेताजी ने फोन कर कहा कि कोई छात्र लखनऊ नहीं आएगा, मैं शपथ लेकर सीधे इलाहाबाद आऊंगा. मुख्यमंत्री बनने के बाद बिना किसी जश्न के मुलायम सिंह सबसे पहले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी पहुंचे और अपना पहला सरकारी फैसला छात्र संघों को बहाल करने का लिया.
आजमगढ़ से दिल्ली तक का सफर
धर्मेंद्र यादव लंबे समय तक बदायूं से सांसद रहे, लेकिन 2019 में उन्हें वहां हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद आजमगढ़ उपचुनाव में भी उन्हें हार मिली, लेकिन उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा. 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने आजमगढ़ सीट पर समाजवादी पार्टी का परचम लहराया और भाजपा को करारी शिकस्त दी. आज धर्मेंद्र यादव न केवल अखिलेश यादव के भाई हैं, बल्कि संसद में समाजवादी पार्टी की सबसे मजबूत आवाज भी हैं.
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