उत्तर प्रदेश की राजनीति का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले पश्चिमी यूपी में चुनावी सुगबुगाहट तेज हो गई है. यहां की राजनीति हमेशा से जातियों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन इस बार समीकरण काफी जटिल हैं. जाट और गुर्जर समुदायों के बीच पनप रहा असंतोष आने वाले समय में बड़े उलटफेर का संकेत दे रहा है.
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जाटों की बेरुखी और बीजेपी की चिंता
पिछले एक दशक से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का मजबूत किला रहे जाट समुदाय में अब दरारें और असंतोष साफ दिखने लगा है. हालांकि बीजेपी को भरोसा है कि यह वर्ग उनके साथ बना रहेगा, लेकिन हालिया किसान आंदोलनों और स्थानीय मुद्दों ने इस भरोसे को डगमगाया है. दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी (सपा) इस नाराजगी को भुनाने के लिए जमीन पर सक्रिय है. जाटों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व हमेशा से दबदबे वाला रहा है, लेकिन अब वे अपनी उपेक्षा को लेकर मुखर हो रहे हैं.
गुर्जर समुदाय: गठबंधन की नई धुरी
पश्चिमी यूपी में गुर्जर समुदाय अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर पहले से कहीं अधिक सजग और सक्रिय है. यह समुदाय वर्तमान में विभिन्न दलों के साथ वेट एंड वॉच की स्थिति में है. गुर्जरों का झुकाव जिस ओर होगा, उस दल का पलड़ा भारी होना तय है. समाजवादी पार्टी और आरएलडी जैसे दलों के बीच बदलती केमिस्ट्री इस समुदाय के लिए नए अवसर पैदा कर रही है, जो सत्ताधारी दल के लिए चुनौती बन सकता है.
दलित और महिला वोटर हैं साइलेंट फैक्टर?
इस बार का चुनाव सिर्फ पुरुष प्रधान जातीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा. महिला वोटर एक बड़ा 'एक्स-फैक्टर' बनकर उभर रही हैं. लॉ एंड ऑर्डर (कानून-व्यवस्था) का मुद्दा महिलाओं के लिए सबसे ऊपर है, लेकिन वे अपनी जातीय पहचान को ध्यान में रखकर ही मतदान की दिशा तय कर रही हैं. इसके साथ ही, दलित समुदाय भी राजनीतिक मंचों पर अपनी स्वतंत्र पहचान और हिस्सेदारी की मांग को लेकर अड़ा हुआ है, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय या उससे भी जटिल हो सकता है.
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