Mood Kya Hai Maharajganj: उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछने लगी है. सात बार के सांसद और वर्तमान में यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ माने जाने वाले इस जिले में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प और कड़ा होने के आसार हैं.
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2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत का अंतर 3-4 लाख वोटों से घटकर महज करीब 32 से 35 हजार वोटों पर सिमट जाने के बाद विपक्ष उत्साहित है. वहीं सत्ता पक्ष अपनी साख बचाने की जुगत में है. यूपी Tak के विशेष कार्यक्रम 'मूड क्या है' में जिले के वरिष्ठ पत्रकारों के साथ हुई गहन चर्चा में महाराजगंज की पांचों विधानसभा सीटों (पनियारा, सदर, फरेदा, नौतनवा और सिसवा) का राजनीतिक गणित, स्थानीय मुद्दे और समीकरण खुलकर सामने आए.
विधानसभा सीट-वार सियासी गणित
पत्रकारों के विश्लेषण के अनुसार, जिले की पांचों सीटों पर इस बार कांटे की टक्कर देखने को मिल सकती है.
पनियारा: भाजपा के वरिष्ठ विधायक ज्ञानेंद्र सिंह का दबदबा रहा है.हालांकि इतिहास गवाह है कि जब भी ब्राह्मण चेहरों (जैसे जनार्दन प्रसाद ओझा या जीएम सिंह) ने यहां मजबूती दिखाई है, मुकाबला बेहद कड़ा रहा है.2017 के मुकाबले 2022 में ज्ञानेंद्र सिंह के जीत का अंतर बढ़ा था जो उनकी मजबूत पकड़ को दर्शाता है.
महाराजगंज सदर (सुरक्षित): 2022 में भाजपा के जय मंगल कनौजिया ने भले ही अच्छे अंतर से जीत हासिल की थी. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी सदर सीट पर भाजपा सांसद पंकज चौधरी को महज 164 वोटों की बढ़त मिली थी. इससे साफ है कि सदर सीट पर इस बार मुकाबला बहुत कड़ा होने वाला है.
फरेदा: इस सीट ने इतिहास रचा जब लंबे समय बाद कांग्रेस के वीरेंद्र चौधरी ने जीत दर्ज की. वीरेंद्र चौधरी ने 2002 से लगातार संघर्ष के बाद 2022 में जीत हासिल की और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को कड़ी टक्कर देकर फरेदा में कांग्रेस को फिर से जीवित किया.
नौतनवा: पारंपरिक रूप से अमरमणि त्रिपाठी के वर्चस्व वाली इस सीट पर 2022 में निषाद पार्टी-भाजपा गठबंधन से नए चेहरे ऋषि त्रिपाठी ने जीत दर्ज की थी. अमरमणि त्रिपाठी के जेल से बाहर आने और पूर्व विधायक मुन्ना सिंह के दोबारा सक्रिय होने से इस बार नौतनवा में त्रिकोणीय संघर्ष की संभावना बन रही है.
सिसवा: भाजपा के प्रेम सागर पटेल का यहां प्रभाव है. हालांकि स्थानीय स्तर पर यह चर्चा गर्म है कि खुद प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी यहां से विधानसभा चुनाव के उम्मीदवार हो सकते हैं. सिसवा में जो प्रत्याशी पिछड़े, दलित और व्यापारी वर्ग का समीकरण साधेगा, बाजी उसी के हाथ लगेगी.
जनता के बीच हावी बड़े मुद्दे
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि इस बार केवल मोदी-योगी का चेहरा ही काफी नहीं होगा बल्कि स्थानीय मुद्दे भी चुनाव को प्रभावित करेंगे.
रोजगार और पलायन: महाराजगंज में कल-कारखानों का अभाव है, जिससे भारी संख्या में युवाओं का दूसरे राज्यों व विदेशों में पलायन हो रहा है.बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है.
स्थानीय समस्याएं व खाद की किल्लत: किसानों के लिए खाद की लाइनें, महंगाई, गैस सिलेंडर, और हाल में पेपर लीक जैसे मामलों को लेकर जनता में नाराजगी देखी जा रही है.
विपक्ष की रणनीति: राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े चंदा विवाद और स्थानीय प्रशासनिक स्तर पर हुई नगर पालिका चुनावों की हार जैसे मुद्दों को सपा और पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन भुनाने की कोशिश में जुटा है.
धरातल बनाम सोशल मीडिया की लड़ाई
चर्चा का निष्कर्ष यह रहा कि यद्यपि विपक्ष के पास कई मुद्दे हैं. लेकिन वह अक्सर जमीनी संघर्ष के बजाय सोशल मीडिया पर सीमित रह जाता है. दूसरी ओर भाजपा का संगठन और उनका कैडर धरातल पर लगातार सक्रिय रहता है. महाराजगंज की राजनीति हमेशा से करवट लेने के लिए जानी जाती है.ऐसे में 2027 का यह चुनाव यह तय करेगा कि 2029 के लोकसभा चुनाव में महाराजगंज का 'सियासी बादशाह' कौन बनेगा.
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