UP Kiska: प्रयागराज की हंडिया सीट पर क्या बीजेपी का खुलेगा खाता? 2027 में सपा-बसपा के गढ़ में सेंधमारी की तैयारी!

Handia Assembly Seat: प्रयागराज की हंडिया विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव की बिसात बिछ गई है. 2002 से जीत को तरस रही बीजेपी इस बार निषाद पार्टी के साथ गठबंधन कर सपा-बसपा के इस अभेद्य दुर्ग को ढहाने की तैयारी में है. जानिए क्या हैं यहां के सियासी और जातीय समीकरण.

Handia Assembly Seat

रजत सिंह

11 Apr 2026 (अपडेटेड: 11 Apr 2026, 12:54 PM)

follow google news

Handia Assembly Seat: उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रयागराज की हंडिया विधानसभा सीट एक ऐसी जगह है जहां साल 2002 के बाद से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का खाता तक नहीं खुला है. यह सीट लंबे समय से समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बीच की लड़ाई का केंद्र रही है. 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अभी से यहां चुनावी बिसात बिछने लगी है. जहां सपा अपनी जीत बरकरार रखने के लिए आश्वस्त है. वहीं बीजेपी गठबंधन इस बार परिवर्तन का दावा कर रहा है.

यह भी पढ़ें...

सपा और बसपा की बादशाहत

हंडिया सीट का इतिहास देखें तो यहां मुकाबला अक्सर सपा और बसपा के बीच ही सिमटा रहा है. वर्तमान में हकीम लाल बिंद यहां से सपा विधायक हैं, जो पहले बसपा में थे. सपा का दावा है कि 2027 में फिर से पूर्ण बहुमत की सरकार बनेगी और हंडिया उनकी झोली में ही रहेगी.

प्रशांत कुमार सिंह: निषाद पार्टी और बीजेपी का नया चेहरा?

बीजेपी गठबंधन ने पिछले चुनाव में यहां निषाद पार्टी के जरिए दांव खेला था. लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. इस बार प्रशांत कुमार सिंह, जो सपा के पूर्व प्रत्याशी महेश नारायण सिंह के बेटे हैं मैदान में डटे हुए हैं. प्रशांत सिंह का कहना है कि वह 24 घंटे जनता के बीच रहकर रोज चुनाव लड़ रहे हैं और उन्हें गठबंधन की ओर से जीत की पूरी उम्मीद है.

जातीय समीकरण: जीत की चाबी

हंडिया सीट पर हार-जीत का फैसला यहाँ के जटिल जातीय समीकरण करते हैं:

यादव: लगभग 70,000 (सबसे बड़ी संख्या)

ब्राह्मण: 55,000

बिंद (निषाद): 55,000

जाटव: 33,000

पासी: 20,000

सपा को यहां मुस्लिम-यादव-बिंद के साथ पासी समाज का समर्थन मिलता रहा है. वहीं, बीजेपी गठबंधन की नजर निषाद (बिंद), ब्राह्मण और क्षत्रिय वोटों के ध्रुवीकरण पर है.

स्थानीय जानकारों की राय

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हंडिया में ब्राह्मण वोट बैंक काफी निर्णायक है. यदि बसपा ने फिर से कोई मजबूत ब्राह्मण उम्मीदवार उतारा, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है. हालांकि, प्रशांत सिंह की सक्रियता और निषाद पार्टी के कोर वोटरों का जुड़ाव इस बार समीकरण बदल सकता है.