क्या अब लाल नहीं रहेगा सपा का ड्रेस कोड? 2027 चुनाव से पहले अखिलेश ने दिया एक और बड़ा सरप्राइज

सिमर चावला

• 04:55 PM • 07 Sep 2026

2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले सपा दलित वोटरों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश में जुटी है. पार्टी संगठन में आंबेडकर से जुड़ी पहचान को प्रमुखता देने, छात्र सभा की ड्रेस का रंग लाल से नीला करने और प्रभावशाली दलित नेताओं को साथ लाने की तैयारी कर रही है.

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उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने दलित वोट बैंक को लेकर अपनी रणनीति तेज कर दी है. बसपा के पारंपरिक दलित आधार में सेंध लगाने और अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण को मजबूत करने के लिए सपा अब बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर की पहचान से खुद को और करीब जोड़ने की तैयारी में है.

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सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश यादव के निर्देश पर पार्टी संगठन में कई बदलाव किए जा रहे हैं. इनमें सपा के कार्यालयों में बाबा साहब की प्रतिमा या तस्वीर लगाना और पार्टी के कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी को प्रमुखता देना शामिल है. इतना ही नहीं, सपा छात्र सभा की सालों पुरानी लाल रंग की ड्रेस भी अब नीली करने की तैयारी है. ऐसे में सवाल है कि क्या सपा की नई रणनीति दलित राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है?

सपा के हर कार्यालय में होगी बाबा साहब की तस्वीर?

सूत्रों के मुताबिक, सपा नेतृत्व ने पार्टी के सभी छोटे-बड़े कार्यालयों में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा या तस्वीर लगाने के निर्देश दिए हैं. पार्टी के आयोजनों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी बाबा साहब की प्रतिमा को प्रमुखता से रखने की तैयारी है.

सपा इस पहल के जरिए दलित समाज को संदेश देना चाहती है कि पार्टी संविधान और दलितों के अधिकारों को लेकर प्रतिबद्ध है. यह कवायद केवल प्रतीकात्मक नहीं रहे, इसके लिए संगठन के स्तर पर भी दलित नेताओं और प्रभावशाली चेहरों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है.

लाल से नीली होगी सपा छात्र सभा की ड्रेस

सपा की रणनीति में एक और बदलाव की चर्चा है. पार्टी की छात्र सभा की लाल रंग की ड्रेस अब नीले रंग की करने की तैयारी है. नीला रंग डॉ. आंबेडकर और अंबेडकरवादी राजनीति से जुड़ी पहचान के तौर पर देखा जाता है.

डॉ. आंबेडकर ने 1942 में ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन (AISCF) की स्थापना की थी. इसके झंडे में गहरे नीले रंग का इस्तेमाल किया गया था और बीच में अशोक चक्र था. इसके बाद नीला रंग अंबेडकरवादी आंदोलन की पहचान से जुड़ता गया. डॉ. आंबेडकर के औपचारिक परिधान में भी नीले कोट और सूट का इस्तेमाल दिखाई देता है. यही वजह है कि अंबेडकरवादी राजनीति में नीले रंग को खास महत्व दिया जाता है.

दलित नेताओं को भी साथ लाने की तैयारी

सपा की रणनीति केवल बाबा साहब की तस्वीर और नीले रंग तक सीमित नहीं बताई जा रही है. पार्टी दलित समाज में प्रभाव रखने वाले क्षेत्रीय नेताओं को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है.

सूत्रों के मुताबिक, ऐसे नेताओं को इंडिया गठबंधन के मंच पर एक साथ लाने की तैयारी है. सपा नेतृत्व को उम्मीद है कि स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले दलित नेताओं के साथ आने से इस वर्ग के मतदाताओं तक पार्टी की पहुंच मजबूत होगी.

बसपा के वोट बैंक पर नजर, PDA को मजबूत करने की कोशिश

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट लंबे समय से बसपा की सबसे बड़ी ताकत रहा है. ऐसे में सपा की नई कवायद को 2027 के चुनाव से पहले दलित वोटरों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

सपा पहले से ही PDA के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक राजनीतिक समीकरण में जोड़ने की कोशिश कर रही है. बाबा साहब आंबेडकर से जुड़ी पहचान को संगठन और कार्यक्रमों में प्रमुखता देना इसी रणनीति का अगला कदम माना जा रहा है.

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