Mood kya hai Basti: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही पूर्वी यूपी के अहम मंडल मुख्यालय बस्ती में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं. 5 विधानसभा सीटों वाले इस जनपद में फिलहाल समाजवादी पार्टी के पास 3, भाजपा के पास 1 और सुभासपा के पास 1 सीट है. यूपी Tak के शो 'मूड क्या है' में स्थानीय वरिष्ठ पत्रकारों ने बताया कि बस्ती की राजनीति में एससी (दलित) और कुर्मी मतदाता सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं. हालांकि आगामी चुनाव में युवाओं (जेंजी), सवर्णों की नाराजगी, बेरोजगारी और एथनॉल फैक्टरी जैसे स्थानीय मुद्दे मौजूदा समीकरणों को नया मोड़ दे सकते हैं.
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जातीय समीकरण: दलित और कुर्मी तय करते हैं जीत का रास्ता
बस्ती जनपद की राजनीति में जातिगत आंकड़े हमेशा से हावी रहे हैं. जिले में सबसे ज्यादा संख्या अनुसूचित जाति (एससी) मतदाताओं की है, जिसके बाद कुर्मी बिरादरी का अच्छा-खासा प्रभाव है. पूर्वांचल में कुर्मी समाज के बड़े नेता माने जाने वाले राम प्रसाद चौधरी का प्रभाव जिले की सभी सीटों पर देखा जाता है. जब दलित और कुर्मी मतदाता एकजुट होते हैं या किसी एक तरफ झुकते हैं तो चुनावी नतीजे उसी के पक्ष में चले जाते हैं.
5 विधानसभा सीटों का सिलसिलेवार गणित
बस्ती सदर: लंबे समय तक भाजपा का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर वर्तमान में सपा के महेंद्रनाथ यादव विधायक हैं. पत्रकारों का मानना है कि पिछले चुनाव में भाजपा के अंदरूनी कलह और प्रत्याशी से लोगों की व्यक्तिगत नाराजगी के चलते सपा को इसका सीधा फायदा मिला था.
रुधौली: इस सीट पर मुस्लिम और चौधरी बिरादरी का दबदबा है. यहां का चुनावी गणित अक्सर मुस्लिम और प्रत्याशी के व्यक्तिगत प्रभाव पर निर्भर करता है.
हर्रैया: यह ब्राह्मण बहुल सीट है जहां से वर्तमान में भाजपा के अजय सिंह विधायक हैं. हर्रैया में ब्राह्मण मतदाता ही तय करते हैं कि सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी.
कप्तानगंज व महादेवा (सुरक्षित): महादेवा सुरक्षित सीट होने के कारण यहां एससी मतदाता ही प्रत्याशी का भाग्य तय करते हैं. 2022 में यह सीट सुभासपा-भाजपा गठबंधन के खाते में मामूली अंतर से गई थी.
'जेंजी' की नाराजगी और सवर्णों का रुख
जिले में 40 वर्ष से कम उम्र के युवाओं और सवर्ण (विशेषकर ब्राह्मण) वर्ग में वर्तमान नीतियों को लेकर कुछ असंतोष देखा जा रहा है. यूजीसी विवाद, आरक्षण के मुद्दे और रोजगार के अवसरों की कमी को लेकर 'जेंजी' (Gen Z) यानी युवा वर्ग में नाराजगी है. पत्रकारों के अनुसार, यदि यह युवा वर्ग और नाराज सवर्ण मतदाता भाजपा से छिटकते हैं तो इसका सीधा फायदा विपक्षी खेमे को मिल सकता है.
हरीश द्विवेदी का राष्ट्रीय कद बनाम स्थानीय चुनौतियां
पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी को भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री बनाए जाने पर जिले की राजनीति में चर्चाएं गर्म हैं. हालांकि स्थानीय विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव हारने के बाद इस पदोन्नति से राष्ट्रीय स्तर पर तो संदेश गया है. लेकिन धरातल पर यदि सवर्ण और युवा नाराज रहे या प्रत्याशी नहीं बदले गए तो केवल इस पद का चुनावी लाभ मिलना कठिन होगा.
एथनॉल फैक्टरी, स्वास्थ्य और बुनियादी मुद्दे
जिले में विकास और सुविधाओं को लेकर भी कई सवाल बरकरार हैं.
एथनॉल फैक्टरी विवाद: रुधौली में लगी एथनॉल फैक्टरी को राजनीतिक दल स्वार्थ के तहत मुद्दा बना रहे हैं. जबकि कुछ वर्ग इसे रोजगार के रूप में देख रहे हैं.
स्वास्थ्य व शिक्षा की स्थिति: बस्ती में मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज बनने के बावजूद न्यूरोलॉजिस्ट और कार्डियोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है. गंभीर मरीजों को आज भी लखनऊ रेफर करना पड़ता है. साथ ही जिले में एक राज्य विश्वविद्यालय की मांग लंबे समय से लंबित है.
2027 के चुनाव में बस्ती की लड़ाई बेहद दिलचस्प और गंभीर होने वाली है. जहां समाजवादी पार्टी अपने प्रदर्शन को बरकरार रखने की चुनौती का सामना कर रही है. वहीं भाजपा अपने अंदरूनी मतभेदों को सुलझाकर और नए चेहरों पर दांव लगाकर वापसी की उम्मीद में है. अंतिम फैसला जनता 'जेंजी' मतदाता और जातीय ध्रुवीकरण के हाथ में होगा.
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