Budhana Assembly election 2027: मुजफ्फरनगर जिले की बुढ़ाना विधानसभा सीट भले ही कोई बहुत वीआईपी सीट न लगे लेकिन किसानों और जाट राजनीति के लिहाज से यह उत्तर प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण सीटों में से एक मानी जाती है. किसानों की राजधानी कहे जाने वाले 'सिसौली' (टिकैत परिवार का पैतृक गांव) के इस इलाके में खेती-किसानी और गन्ने का मुद्दा हमेशा चुनाव का रुख तय करता है. 2013 के दंगों के बाद से लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव तक बुढ़ाना ने राजनीति के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं.
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2012 में सपा 2017 में बीजेपी और 2022 में सपा-आरएलडी (RLD) गठबंधन ने यहां जीत दर्ज की थी. अब जब 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं और आरएलडी अब एनडीए (बीजेपी) का हिस्सा बन चुकी है, तब सवाल उठ रहा है कि क्या बुढ़ाना में एनडीए अपनी पकड़ मजबूत रख पाएगी या 2024 के लोकसभा नतीजों से उत्साहित समाजवादी पार्टी कोई नया उलटफेर करेगी?
2012 से 2024 तक: बुढ़ाना का बदलता सियासी इतिहास
2012: दंगों से पहले बुढ़ाना में पारंपरिक 'मुस्लिम-जाट' गठजोड़ काफी असरदार माना जाता था. सपा के नवाजिश आलम खान ने आरएलडी के राजपाल सिंह बालियान को हराकर जीत दर्ज की थी.
2017: 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद इस इलाके के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए. 2017 की बीजेपी लहर में उमेश मलिक ने सपा के प्रमोद त्यागी को शिकस्त देकर यह सीट सपा से छीन ली.
2022: सपा और आरएलडी का गठबंधन हुआ.आरएलडी के राजपाल सिंह बालियान ने बीजेपी के उमेश मलिक को करीब 28,310 वोटों के बड़े अंतर से हराकर वापसी की.
2024: आरएलडी ने सपा का हाथ छोड़कर बीजेपी (एनडीए) का दामन थाम लिया. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर सीट (जिसमें बुढ़ाना भी आती है) पर बड़ा उलटफेर हुआ और बीजेपी के कद्दावर जाट नेता संजीव बालियान चुनाव हार गए तथा सपा के हरेंद्र मलिक ने जीत दर्ज की.
2027 की सबसे बड़ी चुनौती
2022 में जब आरएलडी विधायक राजपाल बालियान जीते थे तब उन्हें सपा और मुस्लिम वोट बैंक का भारी समर्थन मिला था. अब आरएलडी के बीजेपी के साथ जाने से 2027 में कई नए सवाल खड़े हो गए हैं.
सीट किसे मिलेगी?
मुस्लिम-जाट समीकरण: सपा का दावा है कि 2022 में राजपाल बालियान को मिले 1.28 लाख वोटों में से 1 लाख से अधिक वोट समाजवादी पार्टी के थे. सपा का मानना है कि इस बार वह अकेले दम पर यहां परचम लहराएगी.
आरएलडी का दावा: आरएलडी विधायक राजपाल बालियान का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बेहतरीन कानून-व्यवस्था, क्षेत्र में कराए गए विकास कार्य और एनडीए गठबंधन की ताकत के दम पर जनता एक बार फिर उन पर भरोसा जताएगी.
कौन तय करता है बुढ़ाना की जीत?
बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र में करीब 3.77 लाख से अधिक मतदाता हैं. अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, इस सीट का सामाजिक समीकरण बेहद दिलचस्प है.
मुस्लिम मतदाता: करीब 70,000 (सबसे बड़ा वोट बैंक)
जाट मतदाता: करीब 32,000
गुर्जर व जाटव मतदाता: करीब 30,000-35,000
ब्राह्मण व त्यागी मतदाता: करीब 25,000 और 10,000
ठाकुर मतदाता: करीब 20,000
अन्य पिछड़ा वर्ग (सैनी, वैश्य, पाल, वाल्मीकि): करीब 5,000 से 7,000 के समूह में।
स्थानीय पत्रकारों की राय
क्षेत्रीय पत्रकारों के अनुसार, वर्तमान में स्थितियां पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं. लेकिन इतना तय है कि मुख्य मुकाबला सीधे तौर पर सपा और एनडीए (बीजेपी/आरएलडी) के बीच ही देखने को मिलेगा. पत्रकारों का मानना है कि अगर समाजवादी पार्टी किसी बहुत मजबूत और जनाधार वाले उम्मीदवार (जैसे प्रमोद त्यागी या कोई अन्य बड़ा चेहरा) को मैदान में उतारती है तो चुनाव बेहद कड़ा और निर्णायक मोड़ ले सकता है.
कुल मिलाकर 2027 के चुनाव में बुढ़ाना की बाजी इस बात पर टिकी होगी कि आरएलडी अपने पारंपरिक जाट वोट बैंक को एनडीए के पाले में कितना रोक पाती है और सपा 2024 के लोकसभा चुनाव के अपने विजयी मोमेंटम को विधानसभा में कितना भुना पाती है.
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