समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के गृह जनपद इटावा में राजनीति का पारा गरमाया हुआ है. वैसे तो पूरा इटावा इलाका सपा का मजबूत गढ़ माना जाता है. लेकिन इटावा सदर विधानसभा सीट पर पिछले दो चुनावों से भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है. बीजेपी की सरिता भदौरिया यहां से लगातार दो बार विधायक चुनी गई हैं. अब जबकि अखिलेश यादव और चाचा शिवपाल सिंह यादव एक साथ आ चुके हैं तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बार सपा अपनी साख वापस बचाने के लिए किसे मैदान में उतारेगी? वहीं क्या बीजेपी सरिता भदौरिया पर ही तीसरी बार दांव लगाएगी या फिर कोई नया चेहरा सामने आएगा?
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बीजेपी का गढ़ में कब्जा और जमीनी स्थिति
इटावा सदर सीट पर फिलहाल बीजेपी की सरिता भदौरिया विधायक हैं. दो बार से लगातार चुनाव जीतने के कारण उनका दावा सबसे मजबूत नजर आ रहा है. क्षत्रिय समुदाय से आने वाली सरिता भदौरिया का क्षत्रिय वोटों के अलावा ब्राह्मण और वैश्य मतदाताओं पर भी अच्छा प्रभाव माना जाता है. इलाके में उनकी एक दबंग और सक्रिय छवि भी है.
हालांकि इस बार उनके सामने कुछ स्थानीय चुनौतियां और नाराजगी भी है. विशेषकर 'लाइन पार' क्षेत्र के लोगों में विकास कार्य और जनसमस्याओं को लेकर स्थानीय विधायक के प्रति असंतोष देखा जा रहा है. इटावा में चुनाव अक्सर विकास से ज्यादा जातिगत समीकरणों और स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाता है. ऐसे में यह नाराजगी बीजेपी के लिए चिंता का विषय बन सकती है.
बीजेपी में और कौन-कौन से चेहरे रेस में?
बीजेपी में सरिता भदौरिया के बाद कई अन्य दावेदार भी अंदरखाने सक्रिय हैं.
वैश्य समुदाय: बीजेपी के वर्तमान जिलाध्यक्ष अनु गुप्ता का नाम चर्चा में है. पार्टी में चर्चा है कि यदि टिकट बदला जाता है तो वैश्य समाज से अनु गुप्ता एक मजबूत विकल्प हो सकते हैं.
क्षत्रिय/चौहान समाज: 'लाइन पार' क्षेत्र से युवा नेता आशीष प्रताप सिंह चौहान का नाम तेजी से उभर रहा है.
अन्य चेहरे: ब्लॉक प्रमुख गणेश राजपूत भी अपनी दावेदारी में लगे हुए हैं. हालांकि पार्टी के भीतर फिलहाल ब्राह्मण समाज से कोई बड़ा और मुखर चेहरा सामने आता नहीं दिख रहा है.
सपा में टिकट के लिए लंबी कतार
पिछले विधानसभा चुनाव में शिवपाल सिंह यादव की भूमिका अलग थी जिसका खामियाजा सपा को हार के रूप में भुगतना पड़ा था. लेकिन इस बार परिस्थिति बदल चुकी है. अखिलेश और शिवपाल के एक होने से सपा का कैडर उत्साहित है. इटावा में शिवपाल सिंह यादव का अपना एक विशाल जनाधार है. माना जा रहा है कि अखिलेश यादव इटावा सदर का टिकट तय करने की पूरी जिम्मेदारी शिवपाल यादव को ही सौंपेंगे.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख दावेदार और जातिगत समीकरण
सपा में इस सीट से दांव ठोकने वालों की एक लंबी सूची है जिसमें हर समाज के नेता अपनी-अपनी सेटिंग में जुटे हैं.
प्रदीप शाक्य 'बबलू' (शाक्य समाज): सपा के वर्तमान जिलाध्यक्ष प्रदीप शाक्य 'बबलू' इस रेस में सबसे आगे माने जा रहे हैं. वे शिवपाल सिंह यादव के बेहद करीबी हैं. बेबाक शैली, कर्मठता और शाक्य मतदाताओं पर पकड़ के कारण उन्हें सबसे मजबूत प्रत्याशी माना जा रहा है.
कुलदीप गुप्ता 'सेंटू' (वैश्य समाज): पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष संटू गुप्ता भी एक बेहद सक्रिय और लोकप्रिय चेहरा हैं. वे प्रोफेसर रामगोपाल यादव के काफी करीबी माने जाते हैं और उन्हें अखिलेश यादव का भी आशीर्वाद हासिल है.
ब्रजभूषण राजपूत (लोधी-राजपूत समाज): इटावा सदर सीट पर लोधी राजपूत मतदाताओं की संख्या निर्णायक भूमिका में है. इस वर्ग को साधने के लिए ब्रजभूषण राजपूत सपा से अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं.
फुरकान अहमद (मुस्लिम समाज): पूर्व चेयरमैन फुरकान अहमद मुस्लिम चेहरा होने के साथ-साथ सभी वर्गों में अपनी व्यक्तिगत साख रखते हैं. माना जाता है कि वह मुस्लिम वोटों के अलावा सर्वसमाज और ब्राह्मण वोटों में भी सेंध लगाने की क्षमता रखते हैं.
फैसला किसके हाथ?
इटावा में सपा के भीतर यह भी देखा जा रहा है कि कौन सा दावेदार परिवार के किस सदस्य (अखिलेश, शिवपाल या रामगोपाल) का करीबी है. यदि शिवपाल यादव की पसंद को प्राथमिकता मिलती है तो बबलू शाक्य का पलड़ा भारी रहेगा, वहीं प्रो. रामगोपाल के समीकरण में संटू गुप्ता आगे आ सकते हैं.अब देखना यह होगा कि बीजेपी क्या सरिता भदौरिया पर ही भरोसा जताकर हैट्रिक की उम्मीद करेगी या फिर सपा का कौन सा दांव बीजेपी के इस किले को ढहा पाएगा.
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