साल 2008 के परिसीमन के बाद वजूद में आई सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट राज्य की राजनीति में अपना खास स्थान रखती है. यह क्षेत्र केवल सियासी फेरबदल के लिए ही नहीं बल्कि पौराणिक मान्यताओं के लिए भी प्रसिद्ध है जहां गोमती तट पर स्थित धोपाप धाम में प्रभु श्रीराम ने ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए स्नान किया था. 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही लंभुआ के चौराहों पर चुनावी सुगबुगाहट तेज हो गई है. परिसीमन के बाद 2012 में समाजवादी पार्टी और उसके बाद 2017 व 2022 में लगातार दो बार भारतीय जनता पार्टी ने यहाँ परचम लहराया है. इस बार क्या लंभुआ का जातीय गणित बदलेगा या बीजेपी अपनी हैट्रिक बरकरार रखेगी, जानिए यहां का पूरा लेखा-जोखा.
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विधायक सीताराम वर्मा के दावे
बीजेपी के मौजूदा विधायक सीताराम वर्मा का दावा है कि उनके कार्यकाल में क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास कार्य हुए हैं. उन्होंने जमखुरी में स्पोर्ट्स स्टेडियम, लंभुआ को नगर पंचायत का दर्जा दिलाना, नया फायर स्टेशन बनवाना, कमल सरोवर का निर्माण और सड़कों को 7 मीटर चौड़ा करने जैसे काम गिनाए. विधायक का कहना है कि उनकी सरकार ने बिना किसी भेदभाव और विवाद के क्षेत्र में शांति और सुरक्षा का माहौल कायम किया है.
पूर्व सपा विधायक संतोष पांडे का पलटवार
2012 के सपा विधायक संतोष पांडे का कहना है कि लंभुआ के बुनियादी ढांचे की नींव उनके कार्यकाल में ही रखी गई थी. उन्होंने कामतागंज में मॉडल स्कूल, लंभुआ में तहसील भवन, महिला अस्पताल, केनौरा में पॉलिटेक्निक, रजवाड़े रामपुर में पावर हाउस, चांदा में आईटीआई तथा धोपाप और पापर घाट के निर्माण का श्रेय अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल को दिया.उनका दावा है कि जनता आज भी उनके अभूतपूर्व विकास कार्यों को याद करती है.
लंभुआ का जातीय और मतदाता समीकरण
लंभुआ विधानसभा क्षेत्र में कुल 3,39,126 मतदाता हैं. यहां किसी एक जाति विशेष का वर्चस्व नहीं रहा है यही वजह है कि क्षत्रिय, ब्राह्मण और पिछड़ा वर्ग समेत सभी समुदायों के प्रतिनिधि यहाँ से जीतकर विधायक बनते रहे हैं.
प्रमुख जातीय आंकड़े (अनुमानित)
दलित: 80,000
ब्राह्मण: 77,000
क्षत्रिय: 42,000
यादव: 42,000
मुस्लिम: 38,000
कुर्मी: 31,000
अन्य जातियां: 29,126
स्थानीय राय और 2027 की सियासी जंग
स्थानीय विश्लेषकों का मानना है कि 2017 से 2022 के बीच पूर्व विधायक देवमणि द्विवेदी के समय 5 बड़े पुलों और जर्जर मुख्य मार्गों की चौड़ाई बढ़ाने जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पास हुए थे, जबकि मौजूदा विधायक ने मुख्य रूप से सरकारी योजनाओं को आगे बढ़ाया है.
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) द्वारा शैलेंद्र सिंह को प्रत्याशी के रूप में चर्चा में रखे जाने और अपना कैडर वोट बैंक मजबूत रखने से मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है. लेकिन मुख्य लड़ाई बीजेपी और सपा (गठबंधन) के बीच ही तय मानी जा रही है.
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