Mood kya hai Mirzapur: यूपी विधानसभा चुनाव में 'मिर्जापुर किंग' कौन बनेगा? पत्रकारों ने बताया सभी सीटों का हाल

मिर्जापुर में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी समीकरण बदलते दिख रहे हैं. 2022 में बीजेपी गठबंधन के क्लीन स्वीप के बाद 2024 के संकेत, पानी-सड़क की समस्याएं और एंटी-इनकंबेंसी ने पांचों सीटों पर मुकाबला रोचक बना दिया है.

Mood kya hai Mirzapur

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Mood kya hai Mirzapur: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच 'यूपी Tak की टीम ने मिर्जापुर जनपद के राजनीतिक और सामाजिक मिजाज का जायजा लिया. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में मिर्जापुर की सभी 5 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी पार्टियों (अपना दल 'एस' और निषाद पार्टी) ने कब्जा जमाया था. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने इस गढ़ में सेंधमारी के संकेत दे दिए हैं जहां केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल मड़िहान और मझवा जैसे विधानसभा क्षेत्रों में पिछड़ गई थीं.

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स्थानीय सड़कों की बदहाली, पानी का संकट, 'हर घर जल योजना' के क्रियान्वयन पर उठते सवाल और विधायकों की एंटी-इनकंबेंसी ने 2027 के मुकाबले को बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण बना दिया है. मिर्जापुर की जमीनी हकीकत और पांचों सीटों का समीकरण समझिए क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकारों के गहन विश्लेषण के साथ.

2022 की क्लीन स्वीप बनाम 2024 की चेतावनी

मिर्जापुर जिले में कुल 5 विधानसभा सीटें-नगर, चुनार, मड़िहान, छानबे और मझवा हैं. 

2022 के नतीजे: बीजेपी ने नगर, चुनार और मड़िहान सीटों पर जीत दर्ज की थी. वहीं सहयोगी दल अपना दल (एस) ने छानबे और निषाद पार्टी ने मझवा सीट जीती (मझवा उपचुनाव में बाद में बीजेपी ने जीत दर्ज की).

2024 का टर्निंग पॉइंट: 2024 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी मड़िहान और मझवा विधानसभा क्षेत्रों में सपा से पिछड़ गए. इस बढ़त ने समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरा है जिससे 2027 की लड़ाई सीधी और कांटे की होती दिख रही है.

'हर घर जल' की हकीकत और बुनियादी समस्याओं से गुस्सा

स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकार के बड़े कॉरिडोर (जैसे विंध्य कॉरिडोर) और हाईवे निर्माण के काम जरूर दिखे हैं. लेकिन स्थानीय स्तर पर जनसमस्याओं को लेकर जनता में आक्रोश है.

पानी का संकट: मड़िहान और 96 (छानबे) के पहाड़ी इलाकों में पानी और सिंचाई सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है. पत्रकारों का दावा है कि शहर से लेकर गांव तक 'हर घर जल योजना' धरातल पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पाई है.

सड़क और उपेक्षा का आरोप: मड़िहान के न्याय पंचायत मतवार क्षेत्र के करीब 25 से 26 गांवों में आज तक पक्की सड़क नहीं बन सकी है. पत्रकारों ने सवाल उठाया कि अडाणी पावर प्लांट के लिए जंगल के बीच सड़क बन गई. लेकिन मतवार रोड की सुध नहीं ली गई.

सड़क, स्वास्थ्य और बिजली: नगर विधानसभा में खराब सड़कें, अस्पताल की कुव्यवस्था और विधायकों की जमीनी स्तर पर अनुपस्थिति से स्थानीय लोगों में नाराजगी है.

सीट-दर-सीट मिर्जापुर का सियासी समीकरण

नगर विधानसभा

यहां वर्तमान में विपक्षी पार्टियों के पास कोई बेहद मजबूत और स्थापित चेहरा न होना बीजेपी के लिए राहत की बात है. हालांकि विधायक की क्षेत्र में सक्रियता और शहर की सड़कों-अस्पतालों की बदहाली मुख्य मुद्दा है.

छानबे विधानसभा

अपना दल (एस) के कब्जे वाली इस सीट पर पूर्व विधायक दिवंगत राहुल प्रकाश कोल के निधन के बाद उनकी पत्नी रिंकी कोल को सहानुभूति का लाभ मिला था. लेकिन वर्तमान में क्षेत्र से कनेक्टिविटी न रहने और बुनियादी सुविधाओं (बिजली, पानी, सड़क) के अभाव के कारण अपना दल (एस) के लिए 2027 में यह सीट बचाना मुश्किल साबित हो सकता है. यहां सपा की कीर्ति कोल लगातार सक्रिय हैं.

चुनार विधानसभा

यह कुर्मी/पटेल बाहुल्य सीट है और इसे बीजेपी का परंपरागत गढ़ माना जाता है. चुनार की राजनीति काफी हद तक वाराणसी की राजनीति से प्रभावित होती है. यहां वर्तमान में अनुराग पटेल विधायक हैं. जातीय बाहुल्यता के कारण बीजेपी का पलड़ा यहां मजबूत माना जा रहा है. लेकिन सीधी टक्कर देखने को मिल सकती है.

मड़िहान विधानसभा

सिंचाई और पीने का पानी यहां का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए प्रत्याशी का यहां पिछड़ना इस बात का संकेत है कि अगर स्थानीय समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो 2027 में यहां बड़ा उलटफेर हो सकता है.

मझवा विधानसभा

मझवा में हमेशा से 'बिंद' और 'केवट' (निषाद) मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं. उपचुनाव में बीजेपी ने यहां जीत हासिल की थी. लेकिन 2027 में यहां मुख्य मुकाबला सपा और बीजेपी/गठबंधन के बीच बेहद कड़ा और 'घनघोर' होने के आसार हैं.

क्या बदलेगा हवा का रुख?

वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक 2027 का चुनाव 2017 या 2022 जैसा एकतरफा नहीं रहने वाला है. राष्ट्रीय मुद्दों और भक्ति/कॉरिडोर के विकास से इतर जनता अब रोजगार, खाद-बीज की उपलब्धता, सड़क, बिजली और पानी जैसे रोजमर्रा के मुद्दों पर जवाब मांग रही है. अगर भारतीय जनता पार्टी और अपना दल (एस) ने स्थानीय स्तर पर एंटी-इनकंबेंसी को दूर नहीं किया और नए चेहरों पर दांव नहीं लगाया तो 2027 में मिर्जापुर के सियासी नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं.


 

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