शाहजहांपुर जिले की ददरौल विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की उन खास सीटों में शामिल है जो कभी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का मजबूत किला मानी जाती थी. राममूर्ति सिंह वर्मा और अवधेश कुमार जैसे दिग्गजों का यहां दबदबा रहा. लेकिन 2017 के बाद से यहां का सियासी मिजाज ऐसा बदला कि भारतीय जनता पार्टी ने लगातार जीत की हैट्रिक लगा दी. 2017 और 2022 में बीजेपी के मानवेंद्र सिंह ने परचम लहराया तो 2024 के उपचुनाव में उनके बेटे अरविंद सिंह ने जीत दर्ज कर इस गढ़ को बरकरार रखा. 2027 के विधानसभा चुनाव के करीब आते ही सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी यहां अपनी बादशाहत कायम रखेगी या सपा का 'पीडीए' समीकरण पासा पलटेगा? आइए 'यूपी किसका' में समझते हैं दद्रौल सीट का पूरा सियासी गणित.
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विकास के नाम पर वोट और बीजेपी का दबदबा
ददरौल विधानसभा कभी जिले के सबसे पिछड़े इलाकों में गिनी जाती थी. लेकिन मौजूदा विधायक अरविंद सिंह का दावा है कि 2017 के बाद से उनके पिता और उनके कार्यकाल में क्षेत्र की तस्वीर बदली है.
सड़कों का जाल: गंगा एक्सप्रेसवे का गुजरना, बरेली मोड़ से जलालाबाद तक अत्याधुनिक 4-लेन सड़क और चौहनापुर से कुरिया कला-मंदनापुर तक लंबी सड़कों के निर्माण से क्षेत्र में कनेक्टिविटी और औद्योगिक विकास बढ़ा है.
उपचुनाव में जीत: विधायक अरविंद सिंह के अनुसार, उनके स्वर्गीय पिता मानवेंद्र सिंह के कामों और जनसेवा के दम पर ही 2024 के उपचुनाव में जनता ने विकास के आधार पर दोबारा बीजेपी पर भरोसा जताया.
सपा का पलटवार- प्रशासनिक अमले पर आरोप और 'PDA' की उम्मीद
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष तनवीर खान का कहना है कि दद्रौल में सपा का जनाधार लगातार मजबूत हुआ है.
वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी: 2022 के चुनाव में सपा प्रत्याशी राजेश वर्मा करीब 9,000 वोटों से हारे थे. सपा का आरोप है कि 2022 और 2024 उपचुनाव दोनों में ही प्रशासनिक दबाव के चलते सपा प्रत्याशियों को नुकसान पहुंचाया गया.
2027 का समीकरण: सपा का मानना है कि भले ही 2022 के प्रत्याशी राजेश वर्मा अब बीजेपी में चले गए हों. लेकिन अगर पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) वर्ग एकजुट होता है तो 2027 में सपा शाहजहांपुर की सभी छह सीटों पर जीत हासिल करेगी.
जातीय गणित: दद्रौल का सामाजिक समीकरण
दद्रौल विधानसभा में लगभग सवा तीन लाख से अधिक मतदाताओं का गणित बेहद दिलचस्प और निर्णायक है.
दलित मतदाता: 58,000 (सबसे बड़ा वोट बैंक)
अन्य ओबीसी (OBC): 57,000
क्षत्रिय: 55,000
लोधी: 53,000
मुस्लिम: 32,000
यादव: 3,000
वैश्य: 10,000
इस जातीय समीकरण में लोधी और क्षत्रिय वोट बैंक बीजेपी का पारंपरिक आधार माने जाते हैं. वहीं यदि सपा दलित, अन्य ओबीसी, मुस्लिम और यादव वोटों का गठबंधन साधने में सफल होती है, तो मुकाबला कड़ा हो सकता है.
बीजेपी और सपा से कौन-कौन रेस में?
चुनाव जैसे-जैसे पास आ रहा है दोनों दलों में टिकट के दावेदारों की हलचल तेज हो गई है.
बीजेपी से दावेदार: वर्तमान विधायक अरविंद सिंह का दावा मजबूत है. हालांकि सियासी गलियारों में यह चर्चा भी आम है कि उत्तर प्रदेश सरकार में सहकारिता मंत्री जेपीएस राठौर भी यहां से चुनाव लड़ने की तैयारी कर सकते हैं. इसके अलावा सपा से बीजेपी में आए राजेश वर्मा का नाम भी चर्चा में है.
सपा से दावेदार: पूर्व मंत्री अवधेश वर्मा टिकट मांग रहे हैं. इनके अलावा लखन प्रताप सिंह, नीरज मिश्रा (ब्राह्मण सम्मेलनों के बाद सक्रिय) और पूर्व मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा के बेटे राजेश वर्मा के भी सपा के पाले से दावेदारी करने की अंदरखाने चर्चाएं हैं.
कांग्रेस: कांग्रेस की ओर से तनवीर सफदर अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं.
ग्राउंड रिपोर्ट और पत्रकारों का आकलन
स्थानीय पत्रकारों और विश्लेषकों की मानें तो फिलहाल दद्रौल में बीजेपी की स्थिति काफी मजबूत नजर आ रही है. विधायक अरविंद सिंह का जनता से सीधा जुड़ाव 24 घंटे मदद के लिए उपलब्ध रहना और क्षेत्र में हुआ इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट उनके पक्ष में जा रहा है. वहीं विपक्ष के पास अभी तक किसी एक सर्वमान्य चेहरे का तय न होना उसकी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है.
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