Meerut Cantt VidhanSabha 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई ऐसी सीटें हैं जिन्हें किसी खास पार्टी का गढ़ माना जाता है.लेकिन मेरठ कैंट विधानसभा सीट का इतिहास थोड़ा अलग और अनूठा है. प्रदेश में सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो सपा, बसपा या कांग्रेस मेरठ कैंट सीट पर बीते तीन दशकों से सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी (BJP) का ही परचम लहराता आया है.
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2022 के विधानसभा चुनाव में यहां से भाजपा के अमित अग्रवाल ने जीत दर्ज की. इससे पहले 2002 से लेकर 2017 तक सत्य प्रकाश अग्रवाल लगातार विधायक रहे जबकि अमित अग्रवाल 1993 और 1996 में भी इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. यूपी Tak के विशेष शो 'यूपी किसका' में मेरठ कैंट के राजनीतिक समीकरणों, विकास के दावों और 2027 के चुनाव की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई.
विकास के दम पर फिर जीत का दावा
वर्तमान भाजपा विधायक अमित अग्रवाल का कहना है कि दशकों पुराने रुके हुए काम अब पूरे हो चुके हैं.
कनेक्टिविटी व इंफ्रास्ट्रक्चर: बागपत रोड और रेलवे रोड को जोड़ने वाली 800 मीटर लंबी लिंक रोड का निर्माण कराया गया जिससे दिल्ली रोड पर लगने वाले जाम से राहत मिली है.
पुल निर्माण: आबू नाले पर पुल बनने से रेसना और रली गांवों के लोगों को अब मेडिकल कॉलेज जाने के लिए 5-7 किलोमीटर का चक्कर नहीं काटना पड़ता.
रैपिड रेल व मेट्रो: मेरठ को एशिया की पहली आधुनिक रैपिड रेल की सौगात मिली है जिससे दिल्ली का सफर महज 50 मिनट का रह गया है.
वादे पूरे नहीं हुए, इस बार होगा बदलाव
2022 के चुनाव में रनर-अप रही बहुजन समाज पार्टी (BSP) इस बार बड़ा उलटफेर करने का दावा कर रही है. बीएसपी नेताओं का कहना है कि 'पार्टी कार्यकर्ताओं ने विशेष अभियान चलाकर अपने वोट बैंक को कैंट क्षेत्र में काफी मजबूत किया है.' स्थानीय लोगों में वर्तमान विधायक और सरकार के प्रति नाराजगी है क्योंकि वे जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे.
जातीय व सामाजिक समीकरण
मेरठ कैंट विधानसभा क्षेत्र में कुल करीब 3.16 लाख मतदाता हैं जिनका गणित इस प्रकार है.
वैश्य: 70,000
पंजाबी: 50,000
दलित: 40,000 (जाटव ~13,000)
ब्राह्मण: 35,000
मुस्लिम: 25,000
गुर्जर: 20,000
सैनी: 17,000
जाट: 15,000
पंजाबी और वैश्य मतदाताओं का एकतरफा झुकाव भाजपा की तरफ रहा है. इसके साथ ही ब्राह्मण, गुर्जर और जाट वोट बैंक के बड़े हिस्से के कारण भाजपा यहां हर बार भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज करती है.
पत्रकारों का विश्लेषण: क्यों ढहाना मुश्किल है यह किला?
वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार मेरठ कैंट सीट भाजपा के लिए एक तरह से 'अभेद्य किला' बनी हुई है.
शहरी और बाहरी इलाके: गंगानगर, मोदीपुरम और कंकरखेड़ा जैसे इलाकों में मध्यम वर्ग और व्यावसायिक आबादी अधिक है जो विचारधारा और नीतियों के स्तर पर भाजपा से गहराई से जुड़ी हुई है.
आरएलडी गठबंधन का फायदा: राष्ट्रीय लोक दल (RLD) के एनडीए में शामिल होने के बाद जयंत चौधरी के प्रभाव से जाट बहुल ग्रामीण व बाहरी क्षेत्रों में भाजपा की स्थिति और अधिक मजबूत हुई है.
कम मुस्लिम आबादी: अन्य सीटों की तुलना में इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत काफी कम है जिससे ध्रुवीकरण या विपक्ष के पक्ष में एकतरफा गोलबंदी का प्रभाव सीमित रह जाता है.
पत्रकारों का निष्कर्ष है कि फिलहाल कोई ऐसा बड़ा मुद्दा या समीकरण नजर नहीं आ रहा जो भाजपा के इस मजबूत किले में बड़ी सेंध लगा सके. हालांकि 2027 के चुनाव में बीएसपी की ओर से कड़ी टक्कर देने की तैयारी की जा रही है.
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