उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर नामों को बदलने का खेल गरमा गया है. वाराणसी में सीएम योगी आदित्यनाथ ने जैसे ही भदोही जिले का नाम फिर से संत रविदास नगर करने का ऐलान किया, लखनऊ तक इसकी सियासी तपिश महसूस होने लगी.
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2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले इस फैसले ने यूपी का राजनीतिक पारा चढ़ा दिया है. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के एक तीखे बयान ने इस पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया है.
"2027 में जनता सरकार ही बदल देगी"
भदोही का नाम बदले जाने पर अखिलेश यादव ने तंज भरे लहजे में योगी सरकार पर हमला बोला. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि नाम बदलने का खेल अब बहुत दिन नहीं चलने वाला, क्योंकि प्रदेश की जनता अब मन बना चुकी है.
जो लोग देवी-देवताओं तक का नाम बदल सकते हैं, उनसे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं? नाम बदलने का खेल अब खत्म होगा, क्योंकि लोग सरकार ही बदलने के लिए तैयार हैं.
अखिलेश का बयान यह बताने के लिए काफी है कि विपक्ष इस बार भाजपा को नाम बदलने की राजनीति पर घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता.
भदोही से 'संत रविदास नगर' तक का पूरा विवाद
यह कोई पहली बार नहीं है जब इस जिले का नाम बदला गया हो. इसका इतिहास नाम बदलने की राजनीति से काफी पुराना रहा है:
- 1994 में शुरुआत: मायावती सरकार के दौरान वाराणसी से अलग करके एक नया जिला बनाया गया था, जिसे संत रविदास नगर नाम दिया गया.
- 2014 में फैसला बदल गया: 6 दिसंबर 2014 को उस वक्त की अखिलेश यादव सरकार ने इसका नाम बदलकर वापस भदोही कर दिया था.
- 2026 में फिर वापसी: अब सीएम योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की है कि संत रविदास जी की 650वीं जयंती वर्ष के मौके पर इसे फिर से संत रविदास नगर नाम दिया जाएगा.
सीएम योगी का तीखा हमला
वाराणसी में बीजेपी के 'समरसता संकल्प अभियान' की शुरुआत करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास के प्रति सम्मान की बात तो कही ही, साथ ही समाजवादी पार्टी पर भी करारा हमला बोला.
सीएम योगी ने कहा कि संत रविदास जी के सम्मान में लिया गया फैसला उन लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं आएगा, "जो बाबर और औरंगजेब को अपना आदर्श मानते हैं." उन्होंने आरोप लगाया कि सपा हमेशा से समाज को बांटने और लोगों को आपस में लड़ाने का काम करती आई है.
2027 का असली सियासी दंगल
यूपी में 2027 का चुनाव अभी दूर जरूर दिखता है, लेकिन भाजपा का यह दलित आउटरीच अभियान और सपा का पलटवार साफ इशारा कर रहा है कि चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है. अब देखना यह होगा कि नाम बदलने का दांव भाजपा के काम आता है या फिर अखिलेश यादव का 'सरकार बदलने' का दावा सच साबित होता है
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