Raebareli News: रेलवे भले ही बुलेट ट्रेन और आधुनिक स्टेशनों के हसीन सपने दिखा रहा हो, लेकिन धरातल पर हकीकत इस कदर कड़वी है कि यात्रियों के आंसू निकल आएं, जगतपुर ब्लॉक के लक्ष्मणपुर रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की सहूलियत के नाम पर 'सन्नाटा' पसरा हुआ है. बुनियादी सुविधाएं इस कदर नदारद हैं कि रेलवे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. रायबरेली, ऊंचाहार, प्रयागराज, लखनऊ, मेरठ और बरेली जैसे बड़े शहरों के लिए रोज़ाना सैकड़ों मुसाफिर यहां से अपनी जान जोखिम में डालकर सफर की शुरुआत करते हैं, बदले में उन्हें मिलती है सिर्फ प्रताड़ना.
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स्टेशन पर पैर रखते ही अव्यवस्थाओं का ऐसा 'गर्म' स्वागत होता है कि यात्री तौबा कर उठते हैं। पहले जो थोड़ा-बहुत सहारा देने के लिए टिनशेड लगा था, उसे भी उखाड़ फेंक दिया गया. नतीजा? अब चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी में मुसाफिरों को खुले आसमान के नीचे खड़े होकर ट्रेनों का इंतजार करना पड़ता है। सोने पर सुहागा यह कि प्लेटफॉर्म पर एक अदद पंखा तक नसीब नहीं है. मुसाफिर बूंद-बूंद पसीने से तर-बतर होकर रेलवे को कोसते नजर आते हैं. बैठने के नाम पर लगीं सीमेंट की बेंचें भी टूटकर गवाही दे रही हैं कि यहाँ 'सिस्टम' गहरी नींद सो रहा है. दोनों प्लेटफॉर्म्स की हालत जर्जर हो चुकी है.
फ्लोराइड युक्त पानी या 'बीमारी की गारंटी'?
प्यास बुझाने के लिए स्टेशन पर लगे दो इंडिया मार्का हैंडपंपों में से एक तो अरसे से दम तोड़ चुका है. जो दूसरा चल रहा है, वह पानी नहीं बल्कि 'फ्लोराइड का जहर' उगल रहा है। मजबूरी में यात्री इस भीषण गर्मी में पानी की एक-एक बूंद के लिए भटकने को मजबूर हैं.
अंधेरे में डूबता स्टेशन, गंदगी का अंबार
इतना ही नहीं, सूरज ढलते ही लक्ष्मणपुर स्टेशन पर 'अंधेर नगरी' का नजारा दिखने लगता है. रात के समय पर्याप्त रोशनी न होने से यात्रियों खासकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पूरी तरह भगवान भरोसे है. पूरे परिसर में गंदगी की भरमार है, जिससे उठती सड़ांध ने जीना मुहाल कर रखा है.
स्टेशन अधीक्षक इंद्रपाल सिंह ने बताया कि यात्रियों की इन तमाम दिक्कतों और बदहाली को लेकर कई बार उच्च स्तर पर रेलवे प्रशासन को पत्राचार के माध्यम से अवगत कराया जा चुका है. फिलहाल हमारे पास जो भी सीमित संसाधन उपलब्ध हैं, उन्हीं के अनुसार यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने का प्रयास किया जा रहा है.
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