Kasganj Sadar Assembly Seat: उत्तर प्रदेश की कासगंज सदर विधानसभा सीट उन सीटों में से एक है, जहां वोट किसी पार्टी की लहर देखकर नहीं दिए जाते हैं. इस सीट पर उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए स्थानीय मुद्दे, जातीय समीकरण और जमीनी पकड़ अहम होते हैं. इस सीट पर लोध राजपूत, शाक्य और गैर-यादव ओबीसी वोटर चुनाव के नतीजे पलटने में बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं. 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से यह चर्चा तेज है कि क्या लगातार दो बार जीत दर्ज करने वाली बीजेपी यहां हैट्रिक लगा पाएगी या फिर 2012 में जीतने वाली समाजवादी पार्टी (सपा) वापसी करेगी.
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पिछले तीन चुनावों का परिणाम
साल 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के मानपाल सिंह ने जीत दर्ज की थी. उन्होंने 48,535 वोट हासिल करके बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के हसरत उल्ला शेरवानी को करीब 10,000 वोटों से हराया था. इसके बाद 2017 में बीजेपी ने वापसी की और देवेंद्र सिंह राजपूत ने लगभग 1,11,000 वोट पाकर सपा के हसरत उल्ला शेरवानी को 52,000 वोटों के बड़े अंतर से हरा दिया. साल 2022 में भी बीजेपी का दबदबा कायम रहा और देवेंद्र सिंह राजपूत ने सपा के मानपाल सिंह वर्मा को हराकर दोबारा विधायक की कुर्सी हासिल की.
कासगंज सीट का जातीय समीकरण
कासगंज सदर एक लोध बाहुल्य सीट मानी जाती है, जहां लोधी राजपूत वोटर सबसे ज्यादा यानी करीब 25 प्रतिशत हैं. इसके बाद मुस्लिम वोटर 12 प्रतिशत, ठाकुर राजपूत 12 प्रतिशत और ब्राह्मण मतदाता लगभग 10 प्रतिशत हैं. अन्य जातियों में शाक्य 8 प्रतिशत, जाटव 8 प्रतिशत, यादव 5 प्रतिशत, धीमन 4 प्रतिशत, बघेल 3 प्रतिशत और तेली समाज के करीब 2 प्रतिशत वोटर हैं. बाकी 11 प्रतिशत में अन्य जातियां आती हैं. इसी लोध बाहुल्य समीकरण के चलते साल 1993 में कल्याण सिंह (बाबूजी) ने भी यहां से चुनाव जीता था.
चुनाव पर बीजेपी-सपा के दावे
बीजेपी अपनी हैट्रिक को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त है. बीजेपी का दावा है कि उसके मजबूत संगठन और डबल इंजन सरकार के विकास कार्यों के दम पर वे जीतेंगे. स्थानीय नेताओं के अनुसार, 99 प्रतिशत गांवों में विद्युतीकरण और सड़कों का निर्माण पूरा हो गया है. दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी का कहना है कि देवेश शाक्य के सांसद बनने से शाक्य समाज का वोट सपा के साथ जुड़ गया है. सपा हारे हुए बूथों पर पीडीए (PDA) की रणनीति के तहत काम कर रही है और 2027 में 100 प्रतिशत जीत का दावा कर रही है.
2027 में किसका पलड़ा होगा भारी?
स्थानीय पत्रकारों और जानकारों का मानना है कि इस सीट पर ज्यादातर लोधी प्रत्याशी ही जीतते आए हैं. हालांकि, 2007 में बसपा की लहर के दौरान हसरत उल्ला शेरवानी ने यहां से जीत हासिल की थी. लोकसभा चुनाव में सपा ने शाक्य प्रत्याशी (देवेश शाक्य) पर दांव लगाया था, जो सफल रहा. हाल ही में अखिलेश यादव ने भी यहां पीडीए सम्मेलन करके सियासी टोह ली है. अगर आगामी चुनाव में सपा किसी मजबूत लोधी या शाक्य चेहरे को मैदान में उतारती है, तो 2027 में दोनों पार्टियों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिलेगी.
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