Prabal Pratap Yadav: देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में जजों के साथ बदसलूकी करने का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है. यहाँ एक युवक ने सुनवाई के दौरान फाइल के पन्ने हवा में उछाले और जजों के साथ अभद्र व्यवहार किया. इस घटना के बाद आरोपी युवक प्रबल प्रताप यादव के परिवार का बयान सामने आया है. जहाँ एक तरफ उसके परिवार ने घर की खराब माली हालत और मानसिक तनाव को इस गलती की वजह बताया है, वहीं दूसरी तरफ पुलिस जांच में नौकरी से निकाले जाने और बदले की भावना की एक अलग ही कहानी निकलकर सामने आई है.
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आर्थिक तंगी से परेशान था परिवार
प्रबल प्रताप यादव उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की भरथना तहसील के नगला जयलाल भोली गांव का रहने वाला है. उसके ताऊ रविंद्र सिंह और पिता सुरेंद्र सिंह यादव ने बताया कि उनका परिवार आर्थिक रूप से बहुत तंग था. प्रबल ने बीएड करने के बाद नौकरी न मिलने पर लखनऊ यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई शुरू की थी. वह अपना खर्च चलाने के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था. उसकी मां कुंती देवी के दिल का ऑपरेशन हुआ था और उनकी किडनी भी खराब थी, जिसके कारण इलाज में काफी पैसा खर्च हो रहा था. प्रबल के पिता एक साधारण किसान हैं और उसकी पढ़ाई में उसके मामा आर्थिक मदद करते थे. दिल्ली जाने से पहले प्रबल ने आगरा में अपनी मां से कहा था कि वह न्याय के लिए अंतिम लड़ाई लड़ने सुप्रीम कोर्ट जा रहा है.
नौकरी से निकाले जाने का विवाद
दूसरी तरफ जांच में यह बात सामने आई है कि प्रबल प्रताप यादव लखनऊ के विकास नगर में एक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनी में काम करता था. वहाँ काम के दौरान वह अपने साथ काम करने वाले एक मुस्लिम सहकर्मी को लगातार परेशान कर रहा था और उसे आपत्तिजनक ईमेल भेजता था. कंपनी की चेतावनी के बाद भी जब वह नहीं सुधरा, तो कंपनी ने उसे नौकरी से निकाल दिया. नौकरी से निकाले जाने के बाद प्रबल ने बदला लेने के लिए कंपनी पर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का मनगढ़ंत आरोप लगाया. वह एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस और कोर्ट के चक्कर काटने लगा. जब 26 फरवरी 2026 को सीजीएम कोर्ट ने उससे सबूत मांगे, तो वह हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया.
अदालत ने खारिज की याचिका
गत 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी. इसी दौरान प्रबल प्रताप ने जजों को 'मिस्टर जुडिशियल सर्वेंट' कहकर संबोधित किया और लखनऊ के विकास नगर के एसीपी के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने लगा. कोर्ट ने उसकी इस हरकत को बेहद गंभीर अवमानना माना. हालांकि, कोर्ट ने उसकी खराब मानसिक स्थिति को देखते हुए उस पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की, लेकिन उसकी याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया. इसके बाद से ही सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं चल रही हैं.
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