2027 में प्रतापगढ़ की रानीगंज सीट पर किसका होगा कब्जा? जातियों का है बड़ा प्रभाव, समझिए पूरा समीकरण

यूपी तक

• 12:59 PM • 11 Jul 2026

Raniganj Assembly Seat: प्रतापगढ़ की रानीगंज विधानसभा सीट पर 2027 चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी अपनी सीट बचाने की कोशिश में जुटी है, जबकि भाजपा अपना खोया जनाधार वापस पाने की तैयारी कर रही है.

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Raniganj Assembly Seat: उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की रानीगंज विधानसभा सीट पर साल 2027 के चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है. इस सीट पर सियासत का समीकरण हमेशा बदलता रहता है और यहाँ हर बार नए समीकरण बनते और पुराने टूटते हैं. साल 2012 में बनी इस विधानसभा सीट का इतिहास रहा है कि यहाँ की जनता ने कभी भी किसी दल को लगातार दो बार जीतने का मौका नहीं दिया है. वर्तमान में समाजवादी पार्टी के विधायक अपनी सीट बचाने की कोशिश में जुटे हैं, तो वहीं भारतीय जनता पार्टी भी यहाँ अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए पूरा जोर लगा रही है.

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रानीगंज का अनोखा राजनीतिक इतिहास

रानीगंज विधानसभा सीट साल 2008 के परिसीमन के बाद वजूद में आई और यहाँ साल 2012 में पहली बार चुनाव हुआ था. साल 2012 के पहले चुनाव में समाजवादी पार्टी के लहर में प्रोफेसर शिवाकांत ओझा ने जीत दर्ज की थी. इसके बाद साल 2017 के चुनाव में भाजपा के अभय कुमार उर्फ धीरज ओझा ने सपा के कद्दावर नेता को हराकर यहाँ पहली बार कमल खिलाया था. लेकिन साल 2022 के चुनाव में समीकरण फिर बदले और समाजवादी पार्टी के डॉ. आर के वर्मा ने भाजपा को हराकर यह सीट दोबारा सपा के खाते में डाल दी.

सपा और भाजपा के दावे

साल 2027 के चुनाव को लेकर दोनों ही दल अपनी जीत के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं. समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक डॉ. आर के वर्मा बेरोजगारी, महंगाई, आरक्षण, जातिगत जनगणना और संविधान जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं. उनका कहना है कि साल 2027 का परिणाम पिछले चुनावों से भी बेहतर होगा. दूसरी तरफ, भाजपा नेता धीरज ओझा का दावा है कि पिछली बार बूथ मैनेजमेंट की कमी और कुछ चूकों की वजह से वे चुनाव हार गए थे. इस बार वे अपनी सभी कमियों को सुधारकर मोदी-योगी के नेतृत्व में यहाँ फिर से जीत हासिल करेंगे.

वोटरों का बड़ा जातीय समीकरण

रानीगंज विधानसभा क्षेत्र में कुल वोटरों की संख्या लगभग 3,34,000 है. यहाँ किसी एक जाति के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता है. इस सीट पर सबसे ज्यादा करीब 80 हजार ब्राह्मण वोटर हैं. इसके साथ ही करीब 60 हजार यादव, 60 हजार पिछड़ा वर्ग (कुर्मी, निषाद, प्रजापति) और 45 हजार अनुसूचित जाति के वोटर हैं. यहाँ ब्राह्मण, कुर्मी और मुस्लिम वोटर मिलकर हार-जीत तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, इस बार का चुनाव प्रत्याशियों के चयन और भाजपा के अंदर की गुटबाजी को दूर करने पर निर्भर करेगा. इसके साथ ही सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे भी यहाँ काफी असरदार रहेंगे.