CJI को गाली देने वाले प्रबल यादव की मुस्लिम युवती की वजह से गई थी नौकरी! सॉफ्टवेयर इंजीनियर से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने की पूरी कहानी

सुषमा पांडेय

• 09:33 AM • 12 Jul 2026

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान काला कोट पहनकर पहुंचे प्रबल प्रताप यादव ने जजों के सामने दस्तावेज उछाले और CJI के लिए अपशब्द कहे. आसान शब्दों में पढ़िए कौन है प्रबल यादव और पूरा घटनाक्रम.

Prabal Yadav

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देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसी घटना सामने आई जिसने न्यायपालिका की गरिमा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए. काला कोट पहनकर पहुंचे एक शख्स ने सुनवाई के दौरान जजों को संबोधित करते हुए खुद आदेश देने की कोशिश की, फिर CJI के लिए अपशब्द कहे और अपने साथ लाए दस्तावेज हवा में उछाल दिए. इसके बाद कोर्ट रूम में मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उसे बाहर ले जाकर रोक लिया. इस घटना के बाद सोशल मीडिया से लेकर कानूनी हलकों तक चर्चा शुरू हो गई कि आखिर यह शख्स कौन है और उसने ऐसा कदम क्यों उठाया.

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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान हुआ हंगामा

यह घटना उस समय हुई जब सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक की बेंच सुनवाई कर रही थी. इसी दौरान काला कोट पहनकर पहुंचे एक व्यक्ति ने जजों को 'मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट' कहकर संबोधित किया. बताया गया कि उसने कहा कि वह अदालत को आदेश देता है कि लखनऊ के विकासनगर एसीपी के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाए. इस पर बेंच ने उससे पूछा कि क्या वह अदालत को आदेश दे रहा है. इसके जवाब में उसने कहा कि उसे और कुछ नहीं कहना है, बाकी सब कुछ दस्तावेजों में लिखा है.

इसके बाद उसने अपने साथ लाए करीब 185 पन्नों के दस्तावेज हवा में उछाल दिए, कथित तौर पर CJI के लिए अपशब्द कहे और न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठाए.

सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत संभाला मोर्चा

घटना के तुरंत बाद कोर्ट रूम में मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उस व्यक्ति को पकड़ लिया और बाहर ले गए. उसे कुछ समय तक रोके रखा गया और बाद में छोड़ दिया गया. अदालत ने उसकी हरकत पर नाराजगी जरूर जताई और इसे अवमाननापूर्ण माना, लेकिन उसके खिलाफ तत्काल कोई सजा या अन्य कार्रवाई नहीं की गई. अदालत की ओर से उसकी मानसिक स्थिति का हवाला दिया गया.

कौन है प्रबल प्रताप?

वारदात को अंजाम देने वाले व्यक्ति का नाम प्रबल प्रताप यादव है. वह इटावा के भरथना का रहने वाला है. बताया गया कि वह पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और लखनऊ के विकासनगर स्थित एक कंपनी में काम करता था.

कंपनी से क्यों हटाया गया?

रिपोर्ट में बताया गया कि कंपनी में काम करने के दौरान उस पर अपनी एक मुस्लिम महिला सहकर्मी को आपत्तिजनक ईमेल भेजने और अभद्र टिप्पणियां करने के आरोप लगे थे. महिला कर्मचारी ने इसकी शिकायत कंपनी प्रबंधन से की. इसके बाद कंपनी ने पहले उसे समझाया और चेतावनी दी, लेकिन जब कथित तौर पर उसकी गतिविधियां नहीं रुकीं तो उसे नौकरी से निकाल दिया गया.

नौकरी जाने के बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई

नौकरी से हटाए जाने के बाद प्रबल प्रताप ने कंपनी पर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया और उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश शुरू की. बताया गया कि पहले उसने पुलिस से शिकायत की, लेकिन मामला दर्ज नहीं हुआ. इसके बाद उसने नवंबर 2025 में लखनऊ की सीजीएम कोर्ट में कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की अर्जी दी.

रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने पुलिस से रिपोर्ट मांगी. 26 फरवरी 2026 को पुलिस रिपोर्ट आने के बाद अदालत ने मामले को एफआईआर के बजाय निजी शिकायत के रूप में दर्ज कर लिया.

हाईकोर्ट से भी नहीं मिली राहत

6 अप्रैल 2026 को उसे अपने साक्ष्य पेश करने थे, लेकिन वह एफआईआर दर्ज कराने की मांग पर अड़ा रहा. इसके बाद उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में याचिका दायर कर शिकायत केस खत्म कर सीधे एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने की मांग की. रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया कि मामला पहले से सीजीएम कोर्ट में लंबित है और वहीं उसकी सुनवाई होगी.

फिर पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद प्रबल प्रताप सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. उसने विकासनगर एसीपी के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर याचिका दायर की थी. इसी मामले की सुनवाई के दौरान उसने कोर्ट में हंगामा किया और दस्तावेज उछाल दिए.

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

सुप्रीम कोर्ट में इससे पहले भी ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं. 2025 में सीजेआई बीआर गवई की ओर जूता फेंकने की कोशिश का मामला सामने आया था. रिपोर्ट के अनुसार, वकील राकेश किशोर ने सुनवाई के दौरान नारेबाजी करते हुए जूता उछालने की कोशिश की थी.

वहीं 26 फरवरी 1999 को वकील नंदलाल बलवानी ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एएस आनंद की पीठ के सामने जूता फेंक दिया था. बाद में उनके खिलाफ कार्रवाई की गई और उनकी वकालत पर रोक लगा दी गई थी.

फिलहाल कई सवाल बरकरार

सुप्रीम कोर्ट में हुई इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर एक याचिकाकर्ता कोर्ट रूम तक पहुंचकर इस तरह की हरकत कैसे कर पाया. साथ ही यह मामला न्यायपालिका की गरिमा और अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी नई बहस खड़ी कर रहा है.