चारों तरफ ऊंची दीवारें,लोहे की सलाखें और संगीन जुर्म का साया. लेकिन मेरठ की चौधरी चरण सिंह जिला कारागार का माहौल आजकल कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है. अपने ही पतियों की हत्या के जुर्म में सलाखों के पीछे पहुंचीं 'कातिल हसीनाएं' इन दिनों नफरत और गुनाह के अंधेरे से दूर पुराने प्यार भरे और दर्दभरे नगमों के सहारे अपनी सजा काट रही हैं. जेल में शुरू हुए इंटरनल रेडियो स्टेशन 'रेडियो परवाज़' पर इन दिनों सबसे ज्यादा डिमांड 70, 80 और 90 के दशक के रोमांटिक और सैड गानों की आ रही है.
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मेरे महबूब कयामत होगी गाने की हाई डिमांड
मेरठ जेल प्रशासन के मुताबिक महिला और पुरुष बंदी अपनी पसंद के गानों की पर्ची एक दिन पहले ही जेल स्टाफ को सौंप देते हैं जिसे अगले दिन प्रसारित किया जाता है. खास बात यह है कि जेल में बंद महिला अपराधियों की ओर से प्यार और जुदाई के गीतों की सबसे ज्यादा मांग आ रही है.
जिन गानों की सबसे ज्यादा फरमाइश आ रही है उनमें शामिल हैं 'मेरे महबूब कयामत होगी, शीशा हो या दिल हो आखिर टूट जाता है, हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे, बेखुदी में सनम उठ गए यह कदम, अंखियों के झरोखों से मैंने देखा जो सांवरे...'
इन चर्चित महिला बंदियों की फरमाइश से गूंज रहीं बैरकें
मेरठ जेल में इस समय कई ऐसे चर्चित केस की आरोपी महिलाएं बंद हैं जिन्होंने अपने प्रेमियों के साथ मिलकर खौफनाक वारदातों को अंजाम दिया.
मुस्कान: अपने पति की हत्या कर शव को ड्रम में भरकर सीमेंट से सील करने वाली आरोपी.
रविता और दामिनी: अपने-अपने पतियों को सांप से डसवाकर हत्या की साजिश रचने वाली आरोपी.
गुरप्रीत: प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही मासूम बच्चे की हत्या करने का आरोप.
जेल नियमों के मुताबिक ये महिला बंदी अपने प्रेमियों से सीधे तौर पर मिल नहीं सकतीं.लेकिन चर्चा है कि रेडियो पर गानों की फरमाइश के जरिए ये अपनी भावनाएं बयां कर रही हैं. हालांकि रेडियो पर गाना बजाते वक्त निजता का ध्यान रखते हुए सिर्फ बैरक नंबर का ऐलान किया जाता है.
किरण बेदी के NGO की पहल
इस अनोखे रेडियो स्टेशन 'रेडियो परवाज़' की शुरुआत मई 2026 में हुई है.इसे भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी डॉ. किरण बेदी के एनजीओ 'इंडिया विजन फाउंडेशन' के सहयोग से तैयार किया गया है.यह रेडियो स्टेशन काफी आधुनिक है जहां कंप्यूटर, म्यूजिक मिक्सर, सारेगामा कारवां और हाईटेक स्पीकर्स लगाए गए हैं. सुबह और शाम दो-दो घंटे इसका प्रसारण होता है. रेडियो जॉकी की जिम्मेदारी भी जेल का ही एक बंदी संभालता है और जो कैदी गाना गाने के शौकीन हैं वे खुद माइक पर आकर भी गा सकते हैं.
वरिष्ठ जेल अधीक्षक वीरेश राज शर्मा ने क्या बताया
वरिष्ठ जेल अधीक्षक वीरेश राज शर्मा ने बताया कि 'जेल में लगभग 67% कैदी 30 साल या उससे कम उम्र के हैं. युवा बंदी 70, 80 और 90 के दशक के प्यार भरे और दिल टूटने वाले नगमे ज्यादा सुनना पसंद करते हैं. इस पहल से बंदियों के बीच होने वाले आपसी झगड़े और नोक-झोंक कम हुई है.डिप्रेशन और नशा मुक्ति केंद्र में रहने वाले बंदियों का मानसिक तनाव भी गानों की मदद से काफी हद तक दूर हो रहा है.'
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