कौन थे चंद्रशेखर उर्फ फरसा बाबा जिनकी मौत के बाद हालात काबू करने के लिए सेना की टुकड़ी को उतरना पड़ा?

कौन थे मथुरा के 'फरसा वाले बाबा' जिनकी मौत पर उबल पड़ा ब्रज? 8 साल की उम्र में संन्यास से लेकर अयोध्या आंदोलन और गोसेवा तक, जानें बाबा चंद्रशेखर का पूरा सफरनामा.

Farsa Baba Life Story

सुधीर शर्मा

21 Mar 2026 (अपडेटेड: 21 Mar 2026, 05:42 PM)

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मथुरा के छाता में शनिवार सुबह उस समय तनावपूर्ण स्थिति बन गई, जब बाबा चंद्रशेखर उर्फ फरसा वाले बाबा की मौत के बाद लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. आक्रोशित भीड़ ने दिल्ली-आगरा हाईवे जाम कर दिया और पुलिस पर पथराव किया. इस दौरान कई पुलिस वाहन क्षतिग्रस्त हो गए, जिससे इलाके में दहशत का माहौल बन गया. स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले दागने पड़े. हालात की गंभीरता को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई. मौके पर सेना की टुकड़ी ने भी मोर्चा संभाला.

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कौन थे फरसा वाले बाबा?

बाबा चंद्रशेखर मूल रूप से फिरोजाबाद जिले के सिरसागंज कस्बे गांव गोपाल का नगला के निवासी थे. वे गोरक्षा के लिए फरसा लेकर चलने के कारण फरसा वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए. उन्होंने गांव-गांव में गोसेवकों की टीम तैयार की थी, जिसमें करीब 200 युवा सक्रिय रूप से जुड़े थे. उनके बड़ी संख्या में अनुयायी भी थे. अब उनके परिजन गोपाल का नगला छोड़ कर कहीं अन्य चले गए हैं.

बाल अवस्था में ही लिया था संन्यास 

गोपाल का नगला में रहने वाले महेश चंद्र बताते हैं कि बाबा चंद्रशेखर ने महज आठ वर्ष की आयु में ही संन्यास लिया था. माता-पिता के निधन के बाद उन्होंने घर छोड़ दिया और साधु जीवन जीने लगे थे. वे युवा अवस्था मे फैजाबाद (अब अयोध्या) पहुंचे, जहां उन्होंने श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया और लगभग 20 वर्षों तक वहीं रहे.

ब्रज में गोसेवा को समर्पित जीवन

अयोध्या से लौटने के बाद बाबा ब्रज क्षेत्र में आकर बस गए और गोसेवा को अपना मुख्य कार्य बना लिया. छाता ब्लॉक के आजनोख गांव में उनकी एक बड़ी गोशाला है, जहां वे गायों की सेवा करते थे. उनके प्रयासों से आसपास के क्षेत्रों में भी लोग गोसेवा से जुड़े. हर वर्ष गोपाष्टमी के अवसर पर वे भव्य आयोजन करते थे.

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