कान्हा की नगरी वृंदावन, जहां लोग मन की शांति, अटूट आस्था और सुकून की तलाश में आते हैं वहां से एक ऐसी दर्दनाक और रूह कंपा देने वाली खबर सामने आई है. मंदिर में दर्शन करने आए एक नौजवान बेटे की दर्दनाक मौत ने पूरे हंसते-खेलते परिवार को ताउम्र का मातम दे दिया है. एक पिता अपने कलेजे के टुकड़े को लेकर ठाकुर जी के दर पर मन्नत मांगने आया था, लेकिन उसे क्या पता था कि वह यहां से अपने जवान बेटे का शव लेकर लौटेगा.
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छतरपुर से पिता के साथ दर्शन करने आया था अभिज्ञान
जानकारी के मुताबिक, मध्य प्रदेश के छतरपुर के रहने वाले अभिज्ञान गुप्ता अपने पिता के साथ वृंदावन के एक प्रतिष्ठित मंदिर में दर्शन करने के लिए आए थे. पिता और बेटा दोनों ही पूरी श्रद्धा के साथ मंदिर पहुंचे थे. उन्होंने सोचा होगा कि आराम से ठाकुर जी के दर्शन करेंगे, कुछ समय बांके बिहारी की भक्ति में बिताएंगे और फिर सुखद यादें लेकर वापस अपने घर लौट जाएंगे. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. इस धार्मिक यात्रा ने एक पल में ऐसा तूफान लाया कि पिता का संसार ही उजड़ गया.
गर्मी से राहत देने वाला 'वाटर स्प्रे कूलर' बना काल
बताया जा रहा है कि भीषण गर्मी को देखते हुए मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की सुविधा और राहत के लिए एक वाटर स्प्रे कूलर लगाया गया था. इसी कूलर में अचानक करंट आ गया. दर्शन के लिए पहुंचे अभिज्ञान गुप्ता जैसे ही गर्मी से राहत पाने के लिए उस कूलर के पास पहुंचे, वह उसमें आ रहे जोरदार करंट की चपेट में आ गए.
करंट लगते ही मंदिर परिसर और आसपास मौजूद श्रद्धालुओं में अफरा-तफरी मच गई. लोगों ने आनन-फानन में जैसे-तैसे अभिज्ञान को संभाला और तुरंत अस्पताल लेकर भागे. लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. डॉक्टरों के मुताबिक, जब अभिज्ञान को अस्पताल लाया गया, तो उनकी हालत बेहद नाजुक थी और उन्हें बचाया नहीं जा सका; डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.
भैया उठ जाओ... अस्पताल का वो मंजर जिसने सबका दिल चीर दिया
इस पूरे हादसे की सबसे हृदयविदारक और दर्दनाक तस्वीर अस्पताल से सामने आई. कुछ देर पहले तक जो जवान बेटा पिता की उंगली थामकर चल रहा था, बातें कर रहा था, दर्शन की प्लानिंग कर रहा था, वह अब बिल्कुल बेजान और शांत पड़ा था. बदहवास पिता बार-बार अपने मृत बेटे के शव के पास जाकर बिलख रहे थे और एक ही गुहार लगा रहे थे, "भैया उठो... देखो पापा बुला रहे हैं. भैया उठ जाओ, देखो पापा बुला रहे हैं. उठ जाओ भैया, भैया उठ जाओ... पापा बुला रहे हैं..."
पिता के मुंह से निकले ये शब्द सिर्फ एक आवाज नहीं थे, बल्कि एक बाप की टूटती उम्मीदें और वो अटूट भरोसा था जो आखिरी पल तक यह मानने को तैयार नहीं था कि उसका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा और वह कभी जवाब नहीं देगा. जिस बेटे को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिसके भविष्य के सपने बुने, उसे अपनी आंखों के सामने बेजान देखना किसी भी पिता के लिए असहनीय और सबसे मुश्किल पल था.
सुविधा या आफत? लापरवाही पर खड़े हुए बड़े सवाल
यह दर्दनाक हादसा सिर्फ एक पिता और परिवार का दर्द नहीं है, बल्कि मंदिर प्रशासनों और स्थानीय व्यवस्थाओं पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है. श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए जो उपकरण (कूलर) लगाए जाते हैं, क्या उनकी समय-समय पर सुरक्षा जांच नहीं होती? अगर वो उपकरण ही सुरक्षित नहीं हैं, तो वही सुविधा कभी भी काल बन सकती है. आस्था के केंद्र पर आने वाले लोग सुरक्षा की उम्मीद लेकर आते हैं, मौत के खतरे की नहीं. आज एक पिता की गोद सूनी हो गई है और उनके कानों में अब जिंदगी भर सिर्फ अपनी ही वो बेबस आवाज गूंजती रहेगी कि 'भैया उठ जाओ...' लेकिन इस बार बेटा कभी जवाब नहीं देगा.
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