Welcome 2026: सत्ताइस में सत्ता पाने के लिए कितना काम आएगा अखिलेश यादव का ये फॉर्म्युला!

2026 समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के लिए करो या मरो का साल होगा. पंचायत चुनाव, घोसी उपचुनाव, PDA की परीक्षा, गठबंधन संतुलन और बीजेपी की आक्रामक राजनीति तय करेगी 2027 में यूपी की सत्ता का रास्ता.

सुषमा पांडेय

• 03:12 PM • 01 Jan 2026

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2025 की विदाई के साथ उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों का सबसे अहम सवाल ये है कि सत्ताइस में सत्ता किसे मिलेगी. यानी 2027 में यूपी बीजेपी जीत की हैट्रिक लगाएगी या अखिलेश यादव 10 साल पुराना सूखा तोड़कर सत्ता पर फिर काबिज होंगे. करीब 10 साल सत्ता से बाहर होने के बावजूद अखिलेश यादव के इस कॉन्फिडेंस की बुनियाद 2024 के उन लोकसभा नतीजों में छुपी है जब उन्होंने देश के सबसे बड़े सूबे में बीजेपी के छक्के छुड़ाते हुए महज़ 33 सीट पर रोक दिया था. यूपी में 2027 का चुनाव सिर्फ अखिलेश यादव की जीत हार का चुनाव नहीं होगा बल्कि देश की राजनीति में धूमकेतू की तरह छाई उस बीजेपी का भी इम्तहान होगा जिसने जीत को अपनी आदत बना लिया है. इस खास पेशकश में हम आपको बताएंगे 2025 समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के लिए कैसा रहा और क्या हैं आगे की चुनौतियां.

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पंचायत चुनाव की चुनौती

2026 में पंचायत चुनाव होने वाले हैं. वे चुनाव जिन्हें 2027 का सेमीफाइनल कहा जा रहा है. यहीं से 2026 की पहली और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती शुरू होती है. इस चुनाव को सपा और अखिलेश एक लिटमस टेस्ट के तौर पर देख रहे हैं ताकि उसकी चुनावी मशीनरी मजबूत हो सके और सत्ता वापसी का रास्ता आसान बने. वहीं बीजेपी लगातार जमीन पर पैर पसार रही है. खासकर पंचायत स्तर पर. वो अपने हर बार के स्टाइल में पहले से ही मजबूत बूथ नेटवर्क के काम लगी हुई है. सपा के PDA ब्लॉक को चुनौती देने की रणनीति तैयार कर ली गई है..जो एक बड़ा चैलेंज है.

घोसी उपचुनाव किस करवट बैठेगा?

घोसी उपचुनाव भी इसी साल की शुरूआत में होगा. ये सीट सपा की है. सपा विधायक सुधाकर सिंह के निधन के बाद यहां उपचुनाव होना है. समाजवादी पार्टी ने उन्हीं के बेटे सुजीत सिंह को टिकट देकर अपनी जमीनी मजबूती का सहानुभूति लहर के साथ कॉकटेल बनाने की कोशिश की है. घोसी उपचुनाव जीत कर, पूर्वांचल में अपनी पैठ को और मजबूत करना अखिलेश के लिए अहम है. पूर्वांचल ने ही बीजेपी को2024 में पस्त किया. हालांकि लोकसभा चुनावों के बाद हुए उपचुनावों में बीजेपी ने जबरदस्त वापसी की. वैसे अखिलेश यादव उसे बीजेपी की जीत नहीं बल्कि पुलिस-प्रशासन के जबरा इस्तेमाल की जीत करार देते हैं.  खैर इतना तो तय है कि इस उपचुनाव को अखिलेश कतई हल्के में नहीं लेंगे..

अखिलेश की प्रेजेंस

अब जब एक साथ इतने विरोधियों से निपटना है तो अखिलेश यादव खुद को इस साल कैसे प्रेजेंट करते हैं, ये देखना भी दिलचस्प होगा. अगर 2025 के अखिलेश यादव को देखें तो वो ज्यादा अटैकिंग नहीं दिखे वो संयमित, तथ्यों के साथ बोलते दिखे. अखिलेश के इस इमेज की कुछ राजनीति विश्लेषक तारीफ करते हैं तो कुछ आलोचना भी. बीजेपी नेताओं की अखिलेश यादव और सपा पर निगेटिव राजनीतिक बयानबाज़ी जारी है..सीएम योगी आदित्यनाथ की आक्रामकता लगातार बढ़ रही है. उन्होंने भाषायी हथियार से हमले जारी रखे हैं. दिसंबर 2025 में हुए शीतकालीन सत्र में सीएम योगी आदित्यनाथजो बोले तो सारी चर्चाएं खींच ले गए. योगी ने नमूने शब्द का इस्तेमाल कर जुबानी हमला किया. कहा कि ये शब्द मर्यादित नहीं, लेकिन पॉलिटिक्स में मारक जरूर हो सकता है. इस पर अखिलेश यादव ने जो जवाब दिया कि "संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को कम से कम लोक शिष्टाचार का पालन करना चाहिए" ये एक बौद्धिक जवाब था, लेकिन ज्यादा असरदार नहीं. ऐसे में अखिलेश यादव के सामने ये सबसे बड़ी चुनौती है कि बीजेपी खासकर योगी की आक्रामकता के सामने अखिलेश संतुलित प्रतिक्रिया ही देते रहें या फिर फाइटर मोड में आ जाएं, वो भी भाषा के खेल में पड़े बिना, फंसे बिना.  

PDA की पॉलिटिक्स को पास करवान

SP की 2027 की रणनीति का केंद्र उसके PDA वोट बैंक पर है. 2025 में पीडीए पाठशाला जैसे कार्यक्रमों के जरिए पीडीए का नारा खूब चर्चित रहा. खूब सुर्खियां बटोरीं लेकिन इसे बनाए रखना और बूथ लेवल पर वोट में कन्वर्ट करना बहुत बड़ी चुनौती होगी. हाल में जो बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे रहे उसने संकेत दिए हैं कि PDA वोट बैंक की गहराई और मजबूती पर सवाल उठ सकते हैं. अखिलेश के सामने चुनौती है. यादव और मुस्लिम के साथ गैर यादव और दलितों को जोड़े रखना. 

मसलन 2024 में कुर्मी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा सपा की ओर मुड़ा था. लेकिन कुर्मी बिरादरी को रणनीतिक वोटरमाना जाता है. बीजेपी भी इसे अच्छे से जानती है. ऐसे में सात बार के सांसद पंकज चौधरीऔर कुर्मी बिरादरी से हैं उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने बड़ा खेल कर दिया. बीजेपी ने PDA के जवाब में PDR यानि पिछड़ा, दलित, राष्ट्रवाद का फॉर्मूला तैयार किया है. राष्ट्रवाद के नाम पर बीजेपी पिछड़े और दलितों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है. ये अखिलेश के सामने एक गंभीर चुनौती है. वहीं बंटा हुआ दलित वोट भी कभी भी किसी भी करवट बैठ सकता है.. इसमें मायावती भी अखिलेश के लिए चुनौती बन सकती हैं. ऐसे में PDA को और कैसे धारदार बनाया जाए ये भी बड़ा चैलेंज होगा.

संगठन और अनुशासन

अखिलेश यादव का एक बड़ा चैलेंज सपा के कार्यकर्ताओं का वो अति-उत्साह है जो कई बार अनुशासन की सरहद को तोड़ता दिखता है. हाल में हुए बिहार चुनाव से सबक लेते हुए ये कहा जा रहा है कि अखिलेश को इस पर एकदम तगड़े से काम करना होगा नहीं तो दिक्कत हो सकती है. सपा कार्यकर्ताओं की अनुशासनहीनता, अति उत्साह शुरू से पार्टी के लिए चुनौती रही है. इसे बीजेपी हर मंच से दिखाती है. अपने लॉ एडं ऑर्डर के दावे के पैरलल खड़ा करती है. इसके अलावा संगठन में एकजुटता बनाए रखना भी अखिलेश यादव के लिए किसी चुनौती से कम नहीं. हालांकि पिछले 2 साल में पारिवारिक तौर पर एकजुटता ने अखिलेश यादव को मजबूत किया है. इसका असर भी फिर 2024 के चुनाव में देखने को मिला लेकिन अभी पुराने नेताओं vs युवा टीम के टकराव की खबरें सामने आ ही जाती हैं. अखिलेश के आगे बीजेपी का मजबूत संगठन है जिसमें एक साथ कई योद्धा अकेले अखिलेश यादव के सामने होंगे..सबसे एक साथ निपटना भी अखिलेश के लिए आसान नहीं होगा. 

गठबंधन का फॉर्म्युला क्या होगा?

गठबंधन में  संतुलन, INDIA ब्लॉक में तालमेल और सीट-शेयरिंग भी अखिलेश के लिए 2026 की बड़ी चुनौतियों में होगा. हालांकि 2025 में अखिलेश यादव ने बड़े परिपक्व अंदाज में इसे सहज बनाए रखा. वहीं सामाजिक मुद्दे जैसे रोजगार, महंगाई जैसी समस्याओं को जन समर्थन में बदलना भी अखिलेश के लिए सबसे बड़ा चैलेंज होगा. यानि कुल मिलाकर 2025 में सधे, मजबूत अखिलेश यादव के लिए 2026 करो या मरो जैसा साल होगा. इसमें पंचायत चुनाव, गठबंधन, PDA संतुलन ये सब तय करेगी 2027 की बिसात, क्योंकि 2026 की तैयारी ही तय करेगी 2027 के नतीजे.

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