'बेटे से पूछे सवाल, फिर बनाया दबाव'... जज शबीना खान ने बताया IAS दुर्गा शक्ति नागपाल ने कॉल पर क्या-क्या कहा था?

अंचल श्रीवास्तव

25 Aug 2026 (अपडेटेड: 25 Aug 2026, 12:39 PM)

देवीपाटन मंडल की आयुक्त (कमिश्नर) दुर्गा शक्ति नागपाल और गोंडा की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान के बीच 30 साल पुराने मुकदमे को लेकर फोन पर हुई बातचीत का विवाद हाईकोर्ट पहुंच गया है. जज द्वारा दबाव बनाने और धमकी देने के आरोपों के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने इसे प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना माना है.

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देवीपाटन मंडल की कमिश्नर और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल विवादों से घिर गई हैं. दरअसल, कमिश्नर नागपाल और गोंडा की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान के बीच तीन दशक पुराने एक मुकदमे को लेकर हुआ विवाद अब कानूनी रूप ले चुका है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने जज शबीना खान पर कथित प्रशासनिक दबाव बनाने और फोन करने के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए इसे प्रथम दृष्टया 'आपराधिक अवमानना' योग्य माना है.

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आपको बता दें कि न्यायपूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की अदालत ने मामले को उचित आपराधिक अवमानना पीठ के सामने रखे जाने के लिए मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ न्यायाधीश से आवश्यक निर्देश प्राप्त करने का आदेश जारी किया है. 

क्या है पूरा विवाद?

यह पूरा मामला गोंडा शहर के 'ज्योति विद्या मंदिर बनाम नगरपालिका परिषद' (मूलवाद संख्या-721/1997) से जुड़ा हुआ है. यह मामला साल 1997 से अदालत में लंबित है. इस पर स्टे चल रहा था. यह केस सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान की कोर्ट में चल रहा था. 

इसी बीच, 4 अगस्त 2026 को सिविल जज शबीना खान ने जिला जज गोंडा को एक पत्र लिखकर कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल पर फोन करके दबाव बनाने, अनुचित टिप्पणी करने और पद का दुरुपयोग करने के गंभीर आरोप लगाए. दूसरी तरफ, कमिश्नर ने भी प्रशासनिक जज को पत्र भेजकर अपना रुख साफ किया. विवाद के बीच ज्योति विद्या मंदिर के प्रबंधक ने हाईकोर्ट में केस को देवीपाटन मंडल से बाहर (फैजाबाद या लखनऊ) ट्रांसफर करने की याचिका दायर की थी. हालांकि, सुनवाई के दौरान पता चला कि जिला जज गोंडा पहले ही इस केस को दूसरी कोर्ट (एफटीसी नवीन/एसीजेएम, गोंडा) में ट्रांसफर कर चुके हैं, जिस पर हाईकोर्ट ने केस को मंडल से बाहर न भेजने का आदेश दिया.

जज शबीना खान का आरोप: 'बेटे से पूछे सवाल, फिर बनाया दबाव'

जिला जज को लिखे अपने पत्र में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान ने 15 जुलाई 2026 को हुई पूरी बातचीत का ब्योरा दिया:

 

बेटे को पहला फोन (दोपहर 1:26 बजे): शबीना खान के अनुसार, उनके मोबाइल पर एक अज्ञात नंबर से फोन आया. उनके 7 साल के बेटे हस्सान ने फोन उठाया. फोन करने वाली महिला ने पूछा कि "आपकी मम्मी कहां हैं?", जिस पर बच्चे ने बताया कि वे टॉयलेट गई हैं. इसके बाद महिला ने बच्चे का नाम, उम्र और छोटे भाई-बहन के बारे में पूछा. बच्चे द्वारा नाम पूछने पर महिला ने कहा कि "मैं नाम नहीं बताऊंगी, मम्मी से बताऊंगी."

दूसरा फोन और बहस (दोपहर 2:32 बजे): उसी नंबर से दोबारा फोन आने पर जज ने पूछा कि आप कौन हैं, तो सामने से कहा गया- "मैं कमिश्नर देवीपाटन मण्डल दुर्गा शक्ति नागपाल बोल रही हूं. आप कब तक छुट्टी पर रहेंगी?" जब जज ने पूछा कि आप यह सब क्यों जानना चाहती हैं, तो कमिश्नर ने कहा कि "मैं एक बार मुकदमे के बारे में बात करना चाहती हूं जो आपकी कोर्ट में लंबित है." इस पर जज ने यह सोचकर फोन काट दिया कि कोई कमिश्नर किसी मुकदमे के लिए सीधे जज को फोन क्यों करेगा, और यह कोई फेक कॉल भी हो सकता है.

स्टेनो के जरिए संपर्क और फिर तीखी बातचीत (दोपहर 3:32 बजे): इसके बाद कमिश्नर के स्टेनो ने कोर्ट में आकर नंबर मांगा और संपर्क कराया. जब जज की कमिश्नर से बात हुई, तो आरोप है कि कमिश्नर ने कहा- "अच्छा हुआ आपने बात कर ली, नहीं तो मैं आपकी शिकायत हाईकोर्ट में करने वाली थी. आपको तमीज नहीं है कि सीनियर आईएएस ऑफिसर से कैसे बात करते हैं. मैंने सर्विस में ऐसा ऑफिसर नहीं देखा. आपके व्यवहार से लगा कि आप जुडिशल ऑफिसर हैं भी या नहीं..."

जज का जवाब: सिविल जज शबीना खान ने कहा कि वे छुट्टी का कारण या अवधि बताने के लिए बाध्य नहीं हैं और किसी मुकदमे का डिस्कशन फोन पर नहीं किया जा सकता. सरकार का पक्ष रखने के लिए सरकारी वकील पर्याप्त हैं. इस पर कमिश्नर ने कहा कि वे 'केस ट्रांसफर' करवा लेंगी.

जज शबीना खान ने पत्र में लिखा कि कमिश्नर ने अपने पद के प्रभाव का दुरुपयोग कर डराने, शिकायत करने की बात और संस्कारों पर प्रश्न उठाकर अनुचित दबाव बनाने का प्रयास किया है, जिससे वे काफी आहत हैं.

मंडलायुक्त की ओर से जारी आधिकारिक सफाई

मामला तूल पकड़ने के बाद मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल की तरफ से आधिकारिक विवरण और सफाई जारी की गई:

30 साल पुरानी नजूल भूमि का मामला: यह केस लगभग 1997 (30 वर्षों) से लंबित है और अत्यंत मूल्यवान सरकारी नजूल भूमि से संबंधित है. रिकॉर्ड के मुताबिक, इस जमीन पर वर्ष 2008 से बिना विधिक प्रपत्र के एक साधारण कागज के आधार पर पट्टा दर्शाया जा रहा है, जबकि 1985 में पट्टा निरस्त करके भूमि सरकार के नाम दर्ज हो चुकी थी. इस पर एक निजी स्कूल चल रहा है. पदभार संभालने के बाद मंडलायुक्त का उद्देश्य केवल सरकारी भूमि का संरक्षण और सरकारी हितों की प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था.

छुट्टी की जानकारी के लिए फोन: जब यह पता नहीं चल सका कि संबंधित पीठासीन अधिकारी (पीओ) अवकाश से कब लौटेंगी, तो मंडलायुक्त ने केवल यह जानने के लिए फोन किया कि वे कब वापस आ रही हैं.

केस पर नहीं हुई कोई बात: मंडलायुक्त की ओर से स्पष्ट किया गया कि फोन पर न तो वाद के गुण-दोष पर चर्चा हुई, न किसी आदेश या निर्णय पर बात हुई और ना ही वाद संख्या या वाद का नाम लिया गया.

तथ्यात्मक गलतियों का दावा: पत्र में दर्ज "27 वर्ष की सेवा" का उल्लेख गलत है, क्योंकि कमिश्नर की सेवा लगभग 16 वर्ष की है. साथ ही, संदेश मिलने पर पीठासीन अधिकारी ने खुद वापस फोन किया था.

अनुचित टिप्पणी के आरोप: मंडलायुक्त कार्यालय के अनुसार, नियत तिथि पर सुनवाई के दौरान पीठासीन अधिकारी ने कोर्ट में उपस्थित नायब तहसीलदार, लेखपाल और अधिवक्ताओं की मौजूदगी में मंडलायुक्त के प्रति अनुचित टिप्पणी भी की थी.

न्यायपालिका का सम्मान: मंडलायुक्त न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा का पूरा सम्मान करती हैं. उनका उद्देश्य केवल सरकारी भूमि के मामले की प्रशासनिक स्थिति जानना और प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था.

हाईकोर्ट का कड़ा रुख

इन दोनों पत्रों और तथ्यों को सुनने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए माना कि यह पूरा घटनाक्रम प्रथम दृष्टया अदालत के काम में प्रशासनिक हस्तक्षेप है. कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष आपराधिक अवमानना की कार्रवाई के लिए भेजा जा रहा है. 

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