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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान के असल मायने क्या? समझिए

कुमार अभिषेक

Shankaracharya Avimukteshwaranand Controversy: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के मुद्दे पर यूपी की सियासत गरमा गई है. एक तरफ सीएम योगी का 'कालनेमी' वाला तीखा हमला. दूसरी तरफ डिप्टी सीएम केशव मौर्य का 'पूज्य संत' बताकर चरण वंदन. क्या यह यूपी सरकार के भीतर का मतभेद है या नाराज संतों को शांत करने की कोई बड़ी रणनीति? क्या 'ट्रैक-2 डिप्लोमेसी' के जरिए बीच का रास्ता निकाला जा रहा है? पूरा विश्लेषण देखें इस रिपोर्ट में.

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Keshav Prasad Maurya and Avimukteshwaranand Saraswati
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Shankaracharya Avimukteshwaranand Controversy: प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच बढ़ा विवाद अब उत्तर प्रदेश की राजनीति के शीर्ष नेतृत्व के बीच बयानों की जंग में तब्दील हो गया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पिछले दिन के 'कालनेमी' वाले बयान और इसके बाद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य द्वारा शंकराचार्य को 'पूज्य संत' बताकर उनके चरण स्पर्श की बात करने ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है.

योगी का 'कालनेमी' प्रहार: किसके लिए था इशारा?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने हालिया संबोधन में रामचरितमानस के पात्र 'कालनेमी' का जिक्र किया. पौराणिक कथाओं में कालनेमी वह राक्षस था जिसने साधु का वेश धरकर हनुमान जी का रास्ता रोकने की कोशिश की थी. सीएम योगी माघ मेले को एक 'यज्ञ' के समान मानते हैं. उनके इस बयान को इस संदर्भ में देखा जा रहा है कि जो भी इस आयोजन में बाधा डालता है, वह कालनेमी के समान है. हालांकि कुछ जानकार इसे विपक्ष पर हमला मान रहे हैं, लेकिन जिस समय यह बयान आया, उसे सीधे तौर पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के प्रकरण से जोड़कर देखा जा रहा है. प्रशासन और सीएम योगी, दोनों ही इस मुद्दे पर अपना रुख बेहद सख्त रखे हुए हैं.

यहां नीचे आज का यूपी के शो में इस पूरे विश्लेषण को समझिए

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केशव प्रसाद मौर्य का 'सॉफ्ट स्टैंड' क्या ट्रैक-2 डिप्लोमेसी है? 

मुख्यमंत्री के कड़े रुख के विपरीत डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को 'पूज्य संत' बताया और कहा कि उनके साथ जो हुआ, सरकार उसकी जांच कराएगी. मौर्य ने न केवल उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया, बल्कि उनके चरणों में प्रणाम भी निवेदित किया. इसे सीएम योगी के स्टैंड के उलट एक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है. 

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल मतभेद नहीं, बल्कि बीजेपी और संघ परिवार की 'ट्रैक-2 डिप्लोमेसी' हो सकती है. केशव मौर्य विश्व हिंदू परिषद (VHP) की पृष्ठभूमि से आते हैं और संतों के बीच उनकी गहरी पैठ है. ऐसे में जब प्रशासन और मुख्यमंत्री झुकने को तैयार नहीं हैं, तब मौर्य के जरिए संत के गुस्से को शांत करने और बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जा रही है.

सियासी मायने: डब्बे टकरा रहे हैं या इंजन?

इस विरोधाभासी स्थिति को लेकर विपक्ष और गलियारों में चर्चा है कि क्या यूपी सरकार के 'दो इंजन' अब आपस में टकराने लगे हैं. जहां एक ओर प्रशासन ने शंकराचार्य के शिविर पर नोटिस चस्पा कर कड़ा रुख अपनाया है, वहीं सरकार के दूसरे सबसे बड़े पद पर बैठे व्यक्ति का सहानुभूतिपूर्ण बयान कहीं किसी टकराव की ओर तो इशारा नहीं करता है. क्या यह केशव मौर्य का स्वतंत्र स्टैंड है या संघ परिवार की सोची-समझी रणनीति, यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन फिलहाल शंकराचार्य के अनशन और सरकार के बयानों ने यूपी की राजनीति में उबाल ला दिया है.