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सवर्ण वोट को साधने के लिए सपा करने जा रही ‘सामाजिक एकीकरण सम्मेलन’, आखिर क्या है मजबूरी?

आयुष अग्रवाल

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कहते हैं दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है. ऐसे में भाजपा (BJP), समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) से लेकर बहुजन समाज पार्टी (BSP) और कांग्रेस (Congress) ने यूपी को लेकर खास रणनीतियां बनाई हैं. इसी बीच एक खबर को लेकर इस समय सभी सियासी हलकों में चर्चाएं हैं. दरअसल समाजवादी पार्टी एक बार फिर सामान्य वर्ग के लिए सम्मेलन का आयोजन करवाने जा रही है. समाजवादी पार्टी की तरफ से अगले महीने ‘सामाजिक एकीकरण सम्मेलन’ आयोजित किए जाएंगे. इसे समाजवादी पार्टी का एक बार फिर सामान्य वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

अभी तक मिली जानकारी के मुताबिक, ‘सामाजिक एकीकरण सम्मेलन’ की कमान सपा के स्थानीय क्षत्रिय नेता ही संभालेंगे. मगर माना जा रहा है कि अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) भी कुछ सम्मेलन में हिस्सा ले सकते हैं. अभी तक मिली जानकारी के मुताबिक, लखीमपुर खीरी, बांदा और प्रतापगढ़ से सपा के इस ‘सामाजिक एकीकरण सम्मेलन’ की शुरुआत की जाएगी. माना जा रहा है कि घोसी विधानसभा उपचुनाव में क्षत्रिय प्रत्याशी उतारने के फैसले का राजनीतिक लाभ समाजवादी पार्टी लेना चाहती है. 

अब इस खबर ने सियासी गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है. माना जा रहा है कि भाजपा, कांग्रेस की भी सपा के इन सम्मेलनों पर खासा नजर होगी. दरअसल समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व सीएम अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक यानी पीडीए (PDA) नाम का सियासी फॉर्मूला बनाया है. वह इसी फॉर्मूला के साथ चुनाव की रणनीति बना रहे हैं.  इसके जरिए सपा पिछड़ा वर्ग, दलित वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग में ज्यादा से ज्यादा पैठ बनाकर लोकसभा चुनाव 2024 में इसका लाभ लेना चाहती थी. ऐसे में जब से खबर आई है कि सपा अब स्वर्ण समाज यानी सामान्य वर्ग को भी जोड़ने की कोशिश कर रही है, तभी से इसने कई सियासी सवालों को जन्म दे दिया है.

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सपा को है सामान्य वर्ग से दूर जाने का डर?

यूपी में लोकसभा की 80 सीटे हैं. इन 80 सीटों में से करीब 40 सीटों पर स्वर्ण मतदाता यानी सामान्य वर्ग अच्छी संख्या में है. माना जाता है कि यूपी में मतदाताओं में 25 से 28 प्रतिशत वोटर्स स्वर्ण वोटर ही हैं. यूपी में करीब 23 प्रतिशत सवर्ण वोटर्स हैं.  इनमें 9 से 11 प्रतिशत ब्राह्मण हैं, 7 से 8 प्रतिशत राजपूत हैं. इसी के साथ कायस्थ और अन्य सवर्ण जातियां का प्रतिशत 2.25 और 2.75 प्रतिशत है. ऐसे में स्वर्ण समाज की सियासी ताकत को कही से भी कमजोर नहीं आंका जा सकता. 

सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा है कि पिछले कुछ समय से समाजवादी पार्टी के सवर्ण समाज के नेता खुद को पार्टी में हाशिए पर महसूस कर रहे हैं तो वहीं पार्टी के कुछ मुद्दों से काफी अहसज भी हो रहे हैं. अपने-अपने क्षेत्रों में सपा के इन नेताओं को अपने समाज के लोगों के सवालों का भी सामना करना पड़ रहा है.

मानस विवाद को समर्थन और स्वामी प्रसाद मौर्य की तरक्की

जिस तरह से समाजवादी पार्टी ने स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) का कद बढ़ाया है, उसे लेकर भी तमाम सियासी कयास लगाए जा रहे हैं. स्वामी प्रसाद मौर्य लगातार रामचरितमानस को लेकर बयानबाजी कर रहे हैं. जिस तरह से स्वामी प्रसाद मौर्य ने साधु-संतों के खिलाफ मौर्चा खोल रखा है और वह हिंदुत्व को लेकर सख्त लहजे का प्रयोग कर रहे हैं, उसे देख कर ऐसा लगता है कि सपा की तरफ से स्वामी प्रसाद मौर्य को खुली छूट मिली हुई है. फिलहाल स्वामी प्रसाद मौर्य का बद्रीनाथ धाम को बौद्ध मठ बताने वाला बयान पर काफी विवाद हो रहा है.

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सियासी पंडितों का मानना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा के वोट बैंक और खासकर आंबेडकरवादी विचारधारा से प्रभावित लोगों को सपा में लाने की कोशिश कर रहे हैं. वह पिछड़े और दलित समाज को लगातार सपा के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए सपा ने उन्हें खुली छूट दे रखी है.

रोली तिवारी और ऋचा सिंह का निलंबन

इन कयासों ने तब और जोर पकड़ा जब स्वामी प्रसाद मौर्य के विवादित बयानों का विरोध सपा की महिला नेत्री रोली तिवारी मिश्रा और ऋचा सिंह ने किया. ये दोनों ही सपा की वह महिला नेता थी जो सवर्ण समाज से संबंध रखती थी. माना जाता है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के खिलाफ अभियान छेड़ने के आरोप में ही सपा ने इन दोनों महिला नेताओं को पार्टी से निकाल दिया था. सपा की तरफ से कहा गया था कि इन दोनों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से निकाला गया है.

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उस समय भी सियासी गलियारों में ऐसी चर्चाएं थी कि सपा के कई सामान्य वर्ग के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य की बयानबाजी से नाराज थे. मगर समाजवादी पार्टी की रणनीति देखकर वह ज्यादा कुछ कर नहीं पाए. इस पूरे विवाद के दौरान विवादित पोस्टरबाजी भी हुई. सियासी जानकारों की माने तो सपा को इस रणनीति का उतना लाभ नहीं मिला, जितना उसे उम्मीद थी. दूसरी तरफ इस पूरे विवाद के बाद सामान्य वर्ग भी सपा से लगातार दूर जा रहा था. 

फिर करीब आने की कोशिश कर रही है सपा

ऐसे में माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी एक बार फिर स्वर्ण समाज के करीब जाने की कोशिश कर रही है. देखा जाए तो इस समाज को भारतीय जनता पार्टी का पक्का समर्थक माना जाता है. मगर इस समाज का सियासी समर्थन सपा को भी मिलता रहा है. ऐसे में सपा एक बार फिर क्षत्रिय को लुभाने के बहाने स्वर्ण समाज को अपना सियासी संदेश देने की कोशिश कर रही है और स्वर्ण समाज के भी करीब आने की रणनीति अपना रही है. आपको बता दें कि लखीमपुर खीरी में 3 सितंबर से समाजवादी पार्टी के सामाजिक एकीकरण सम्मेलन का शुभारंभ होने जा रहा है. देखना ये होगा कि अखिलेश यादव अपनी इस रणनीति में कितने सफल हो पाते हैं.

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