बीजेपी MLA शलभ मणि त्रिपाठी पर खेल कर देंगे अखिलेश! इस आंकड़े पर सपा को खूब भरोसा
UP News: देवरिया सदर सीट पारंपरिक रूप से भाजपा का गढ़ मानी जाती रही है. क्या शलभ मणि 2027 में दोबारा कमल खिला पाएंगे? सपा यहां खेल खेलने के इरादे में दिख रही है.
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अभी से सुनाई देने लगी है. 'यूपी के किस्से' में आज चर्चा का केंद्र है देवरिया सदर विधानसभा सीट. यहां के विधायक पूर्व पत्रकार और भाजपा के चर्चित चेहरे शलभ मणि त्रिपाठी हैं. क्या शलभ मणि 2027 में दोबारा कमल खिला पाएंगे या फिर लोकसभा चुनाव के बदले हुए समीकरण उनकी राह में रोड़ा बनेंगे, इस पर मंथन शुरू हो गया है.
देवरिया सदर सीट: भाजपा का अभेद्य किला?
देवरिया सदर सीट पारंपरिक रूप से भाजपा का गढ़ मानी जाती रही है. पिछले कुछ चुनावों के नतीजे इस बात की गवाही देते हैं:
2022: शलभ मणि त्रिपाठी (भाजपा) विजयी रहे.
2020 (उपचुनाव): सत्य प्रकाश त्रिपाठी (भाजपा) जीते.
2017 और 2012: जन्मेजय सिंह (भाजपा) ने लगातार दो बार जीत दर्ज की थी.
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समाजवादी पार्टी को यहां आखिरी बार 2002 में दीनानाथ कुशवाहा के रूप में जीत मिली थी.
इस सीट के समीकरण पर देखिए यूपी Tak की ये खास रिपोर्ट
सपा का दावा: 8000 वोटों का फासला और 'वोटर कार्ड' का खेल
भले ही भाजपा का यहां दबदबा रहा हो, लेकिन समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव 2024 के आंकड़ों से उत्साहित है. सपा नेताओं का कहना है कि वे इस सीट पर भाजपा से मात्र 8000 वोटों से पीछे रह गए थे. सपा का दावा है कि एसआईआर (SIR) जांच के दौरान लगभग 88000 फर्जी या दोहरे मतदाता कटे हैं, जो पहले भाजपा के पक्ष में मतदान करते थे. सपा इसे एक बड़ा फैक्टर मान रही है..
जातीय समीकरण: शलभ मणि के पक्ष में?
देवरिया सदर सीट का जातीय ढांचा शलभ मणि त्रिपाठी के 'फायरब्रांड हिंदुत्व' की राजनीति के अनुकूल दिखता है:
ब्राह्मण: लगभग 72,000 (सर्वाधिक संख्या)
क्षत्रिय: 46,000
यादव: 30,000
दलित: 27,000
शलभ मणि त्रिपाठी खुद ब्राह्मण समुदाय से आते हैं, और क्षत्रिय वोट बैंक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम पर भाजपा का पारंपरिक वोटर माना जाता है. ऐसे में हिंदू मतों का ध्रुवीकरण भाजपा के लिए जीत की राह आसान बनाता है.
क्या कहते हैं जानकार?
स्थानीय पत्रकारों और जानकारों की राय बंटी हुई है. कुछ का मानना है कि मेडिकल कॉलेज, रेलवे स्टेशन और बेहतर सड़कों जैसे विकास कार्यों के दम पर भाजपा की वापसी तय है. वहीं, कुछ जानकारों का कहना है कि 2027 का चुनाव 2022 जैसा एकतरफा नहीं होगा और भाजपा को कड़ी टक्कर मिल सकती है.










