आजमगढ़ को अखिलेश ने कर दिया बाय-बाय? कहीं शिवपाल यादव से सुलह के पीछे ये बड़ी डील तो नहीं!

कुमार अभिषेक

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UP Political News: समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गुरुवार को एक बड़ा ऐलान किया. कन्नौज में जब उनसे पूछा गया है कि ‘आपने डिंपल यादव को हमसे क्यों छीन लिया?’ तो अखिलेश यादव ने वहां इशारा दिया कि अब वह खुद कन्नौज का चुनाव लड़ेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि ‘क्या करेंगे खाली बैठकर घर में, अरे हमारा तो काम ही चुनाव लड़ना है.’

आपको बता दें कि अखिलेश यादव का यह जवाब महज यूं ही दिया हुआ नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सोची समझी रणनीति है. सभी जानते हैं कन्नौज अखिलेश यादव के सबसे ज्यादा करीब रहा है और कन्नौज से डिंपल की हार अखिलेश यादव आज तक नहीं भूल पाए हैं. ऐसे में अखिलेश ने पत्नी डिंपल यादव को सुरक्षित मानी जाने वाली मैनपुरी शिफ्ट कर दिया है और अब खुद वह बीजेपी से कन्नौज मेंभिड़ सकते हैं.

अभी तक इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि अखिलेश यादव ने विधानसभा का चुनाव इसलिए लड़ा था कि वह उत्तर प्रदेश में सदन के भीतर बीजेपी सरकार और खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने विपक्ष का चेहरा बनकर खड़े दिखाई दें और सरकार को घेरते रहें. मगर आज जिस तरीके से अखिलेश यादव ने कहा कि वह कन्नौज से चुनाव लड़ सकते हैं, इससे सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई कि कहीं न कहीं अखिलेश यादव की रुचि राष्ट्रीय राजनीति में अभी भी प्रदेश की राजनीति से ज्यादा है.

अखिलेश के इस इशारे से यह साफ पता चल रहा है कि कहीं न कहीं आजमगढ़ छोड़ना प्रदेश की सियासत करने से ज्यादा कन्नौज को वापस लेने की रणनीति का हिस्सा है.

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आजमगढ़ का क्या होगा?

सूत्रों के मुताबिक, चर्चा यह है कि अखिलेश यादव आजमगढ़ से शिवपाल यादव को 2024 में टिकट दे सकते हैं. ऐसे में अखिलेश यादव ने एक तीर से कई निशाने साध लिए. मतलब यह कि आजमगढ़ सीट शिवपाल यादव के कोटे में जा सकती है, अखिलेश यादव खुद कन्नौज से लड़ेंगे, डिंपल यादव मैनपुरी लड़ेंगी, प्रोफेसर रामगोपाल के बेटे के लिए फिरोजाबाद सीट ज्यादा सुलभ हो जाएगी और बदायूं धर्मेंद्र यादव और कासगंज तेज प्रताप यादव के लिए हो सकती है.

बहरहाल, मैनपुरी उपचुनाव के बीच में अखिलेश यादव ने कन्नौज से चुनाव लड़ने का इशारा कर बड़ा धमाका कर दिया है. मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद अखिलेश यादव परिवार की सीटों को सुरक्षित कर देना चाहते हैं, ताकि एक बार फिर यह गढ़ के तौर पर कुछ इस तरीके से बन जाए जिससे यादव परिवार का सियासी वजूद हिल न पाए.

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