Opinion: अखिलेश यादव का 'सनातनी अवतार' और राहुल का 'जनेऊ'... आस्था या 2027 चुनाव का अवसरवाद?
Opinion: उत्तर प्रदेश में 2027 चुनाव की आहट के बीच नेताओं के 'सनातनी अवतार' पर तीखा विश्लेषण. जानिए क्यों भंडारे और मंदिर यात्राओं के पीछे सिर्फ वोटबैंक का अवसरवाद है.
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Opinion: उत्तर प्रदेश में हर चुनाव से पहले ऐसे परिदृश्य दखने को मिलते हैं जो न सिर्फ हास्यास्पद होते हैं, बल्कि कुछ राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रतिबद्धता के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर देते हैं. दशकों तक जिस राजनीति ने 'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण' को अपनी सत्ता की चाबी माना, वही राजनीति जब चुनाव की आहट सुनती है, तो रातों-रात अपना चोला बदलने के लिए व्याकुल हो उठती है. यह देखना बेहद दिलचस्प और विचारोत्तेजक है कि जो नेता और दल कभी बहुसंख्यक समाज की आस्थाओं, प्रतीकों और त्योहारों से दूरी बनाए रखने में ही अपनी धर्मनिरपेक्षता की सार्थकता समझते थे, वे अब माथे पर त्रिपुंड लगाकर, हाथ में पूजा की थाली थामकर और भंडारे का प्रसाद बांटते हुए कैमरों के सामने सहज दिखने का असफल प्रयास कर रहे हैं. जो बहुसंख्यकों की भावनाओं को 'सांप्रदायिकता' कह कर खारिज करते हैं, जो मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों पर व्यंग्य की मुद्रा रखते हैं, वही नेता अचानक ही जनेऊधारी, भंडाराप्रेमी और मंदिरगामी हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि जनता आस्था और अवसरवाद के फर्क को नहीं समझ पाएगी.