Opinion: सनसनीखेज बयान और भ्रामक आंकड़े... राजनीतिक पक्षपात का शिकार होते अविमुक्तेश्वरानंद
क्या एक शंकराचार्य का सार्वजनिक आचरण सनातन परंपरा की मर्यादाओं के अनुरूप है? इस ओपिनियन में लेखक द्वारा मठाम्नाय महानुशासन और सनातन की पारंपरिक कसौटियों के आधार पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के हालिया बयानों, राजनीतिक सक्रियता और सार्वजनिक व्यवहार का विश्लेषण किया गया है.
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Opinion: भारतीय सनातन परंपरा में संन्यास का स्थान किसी भी लौकिक सत्ता, राजनीतिक दल या सांसारिक पद से बहुत ऊपर रहा है. आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'मठाम्नाय महानुशासन' में पीठों के अधीक्षकों (शंकराचार्यों) के लिए जो नियम और आचार-संहिता तय की गई है, वह स्पष्ट कहती है कि एक संन्यासी का एकमात्र कर्तव्य राग-द्वेष, निजी महत्त्वाकांक्षा और दलीय राजनीति से ऊपर उठकर केवल धर्म की रक्षा करना है. शास्त्रकारों ने संतों को परखने के लिए पांच बहुत ही सीधी और स्पष्ट कसौटियां निर्धारित की हैं, समदर्शिता, क्षमा और दया, संतोष और संयम, सत्य और सरलता, तथा भक्ति और निर्लेपता. परंतु जब हम स्वयं को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य बताने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के हालिया बयानों, उनकी चुनावी सक्रियता और उनके सार्वजनिक आचरण को देखते हैं, तो ‘मठाम्नाय महानुशासन’ के सिद्धांत टूटते हुए दिखाई देते हैं. उनके वक्तव्य सनातन की इन पांचों कसौटियों पर न सिर्फ पूरी तरह विफल साबित होते हैं, बल्कि एक तय राजनीतिक एजेंडे और व्यक्तिगत विरोध की पुष्टि करते हैं. एक साधारण इंसान भी उनका वर्तमान आचरण देखकर बता सकता है कि वह एक संन्यासी के स्थापित आदर्शों के विपरीत जा रहे हैं.
