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Opinion: संविधान की दुहाई और मॉक संसद का सियासी मंचन, कांग्रेस-सपा के विरोध की राजनीति पर सवाल

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के मॉक संसद आयोजन पर उठे सवाल. क्या संसद के समानांतर प्रतीकात्मक मंच तैयार करना लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान के खिलाफ है? जानिए पूरा विश्लेषण.

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लोकतंत्र को मजबूत करने में विपक्ष की भूमिका सबसे अहम होती है. वह सरकार की नीतियों की आलोचना करता है और जनता के मुद्दों को भी मजबूती से उठाता है. लेकिन जब विपक्ष राजनीतिक विरोध की अभिव्यक्ति को संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की समानांतर व्यवस्था खड़ी करने जैसे प्रयोगों तक ले जाने लगे, तो उसके औचित्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से जुड़े मॉक संसद के आयोजन ने इसी बहस को फिर सामने ला दिया है. संविधान की रक्षा की बात करने वाले राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि संसद कोई प्रतीकात्मक मंच नहीं, बल्कि जनता के जनादेश से बनी सर्वोच्च विधायी संस्था है. उसका विकल्प मंच सजाकर तैयार नहीं किया जा सकता.

संविधान की बात और संसद का प्रतीकात्मक मंचन

संसद देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ है. वहां जनता के चुने हुए प्रतिनिधि बहस करते हैं, सवाल पूछते हैं, कानून बनाते हैं और सरकार को जवाबदेह ठहराते हैं. संसद की अपनी संवैधानिक प्रक्रिया, नियम और मर्यादाएं हैं. ऐसे में मॉक संसद आयोजित करके उसे वास्तविक संसद और उसकी कार्यवाही के विकल्प की तरह प्रस्तुत करना जनमत का अपमान करना है, और संविधान की रक्षा की दुहाई करने वाले विपक्ष को ये समझना चाहिए कि लोकतंत्र की बुनियाद जनमत पर टिकी होती है. मॉक संसद का आयोजन करके विपक्ष ने लोकतंत्र की बुनियाद पर हमला करने की कोशिश की है.

विरोध की भी होती हैं संवैधानिक सीमाएं

सरकार के फैसलों से असहमति जताना विपक्ष का अधिकार है. चुनाव आयोग के फैसलों पर सवाल उठाना हो, सरकार की नीतियों का विरोध करना हो या किसी कानून के खिलाफ जनआंदोलन चलाना हो, लोकतंत्र में इसके लिए अनेक संवैधानिक और लोकतांत्रिक रास्ते उपलब्ध हैं. संसद में बहस, न्यायालय का दरवाजा खटखटाना, शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जनसभाएं और जनता के बीच संवाद, ये सभी विरोध के स्थापित माध्यम हैं.

लेकिन विरोध के नाम पर संवैधानिक संस्थाओं को ही वैकल्पिक रूप से तैयार कर लेना नीयत पर सवाल खड़े करता है. अगर विरोध के लिए अपनी अदालत, अपनी संसद, अपना प्रधानमंत्री और अपना ही कानून बना लिया जाएगा तो फिर लोकतंत्र में क्या बचेगा. क्या ये अराजकता और तानाशाही नहीं होगी?

मॉक संसद के आयोजन से क्या संदेश देना चाहता है विपक्ष?

इस तरह के आयोजनों के औचित्य पर सबसे बड़ा सवाल उनकी सीमा को लेकर है. यदि राजनीतिक दल अपने विरोध को प्रदर्शित करने के लिए मॉक संसद बना सकते हैं, तो भविष्य में कोई दूसरा समूह अपने स्तर पर समानांतर सरकार, अपने कानून और अपने पदों की घोषणा करने लगे, तो उसकी सीमा कौन तय करेगा? कोई स्वयं को प्रधानमंत्री घोषित कर दे, अपने आवास को प्रधानमंत्री आवास बताने लगे या अपनी बनाई व्यवस्था को संवैधानिक संस्थाओं के बराबर रखने का प्रयास करे, तो क्या उसे भी राजनीतिक अभिव्यक्ति कहकर स्वीकार किया जाएगा? यह सवाल किसी एक आयोजन तक सीमित नहीं है. यह उस राजनीतिक परंपरा से जुड़ा है, जिसमें संस्थाओं की जगह प्रतीकात्मक मंचों को स्थापित करने की कोशिश हो सकती है.

लोकतंत्र में मर्यादा जरूरी, अराजकता नहीं

लोकतंत्र की मजबूती केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसमें विरोध कितना मुखर है, बल्कि इससे भी तय होती है कि राजनीतिक पक्ष उसकी संस्थाओं और प्रक्रियाओं का कितना सम्मान करते हैं. विरोध का अधिकार सत्ता को निरंकुश होने से रोकता है, लेकिन संस्थाओं की वैधता पर बिना ठोस आधार के लगातार सवाल उठाना जनता के भरोसे को प्रभावित कर सकता है.

संविधान किसी दल, गठबंधन या राजनीतिक विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं है. उसकी रक्षा का अर्थ केवल संविधान की प्रति हाथ में लेकर प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि उसकी संस्थाओं, प्रक्रियाओं और मर्यादाओं का सम्मान करना भी है. विपक्ष को सरकार के खिलाफ आवाज उठाने का पूरा अधिकार है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए होना चाहिए, उसे प्रतीकात्मक विकल्पों में बांटने के लिए नहीं. सवाल सरकार के विरोध का नहीं, बल्कि विरोध के तरीके और उसकी संवैधानिक मर्यादा का है.

लेखक डॉ. विनम्र सेन सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक और सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं.

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)