Opinion: EVM पर सवाल, बैलट पर भी बवाल! पराजय के बहाने नहीं छुपा सकते सपा की जमीनी कमजोरी
Opinion: उत्तर प्रदेश में शुक्रवार को 11 सीटों पर एमएलसी चुनाव हुए. मतदान की प्रक्रिया बैलट पेपर से हुई, लेकिन इस दौरान प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी ने चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए.
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Opinion: उत्तर प्रदेश में शुक्रवार को 11 सीटों पर एमएलसी चुनाव हुए. मतदान की प्रक्रिया बैलट पेपर से हुई, लेकिन इस दौरान प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी ने चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए. सपा ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने बूथ लूटे और बूथ कैप्चर किए. लेकिन सपा के इन आरोपों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
दरअसल, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि चुनाव ईवीएम से नहीं, बल्कि बैलट पेपर से होने चाहिए. उनका कहना है कि उन्हें ईवीएम पर भरोसा नहीं है. वह हर चुनाव बैलट पेपर से कराने की मांग करते रहे हैं. इसके लिए वह कई देशों का उदाहरण भी देते हैं. उनका कहना है कि मशीनों के साथ आसानी से छेड़छाड़ की जा सकती है.
लेकिन एमएलसी चुनाव में सपा के आरोपों के बाद सवाल उठता है कि जब यह चुनाव बैलट पेपर से हुआ, तो पार्टी इस पर सवाल क्यों खड़े कर रही है? यहीं से इस बहस को बल मिलता है कि क्या चुनावी प्रक्रिया पर ठीकरा फोड़ना सपा का केवल बहाना है? क्या पार्टी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर अपनी कमजोरियों और हार पर पर्दा डाल रही है? क्या वह इसे बहाने के रूप में इस्तेमाल कर रही है?
ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि समाजवादी पार्टी की राजनीति में चुनावी हार के बाद चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाना अब एक पुराना पैटर्न बन चुका है. कभी ईवीएम को निशाने पर लिया जाता है, तो कभी चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल खड़े किए जाते हैं. लेकिन इसी ईवीएम प्रक्रिया के तहत जब सपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में सफलता मिली, तो पार्टी इस पर चुप रही.
ईवीएम पर सवाल, बैलट से चुनाव पर भी असंतोष
अखिलेश यादव लगातार कहते रहे हैं कि चुनाव बैलट पेपर से कराए जाएं, ताकि चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठने वाले संदेह दूर हो सकें. लेकिन जब एमएलसी चुनाव बैलट पेपर से कराए गए, तब भी समाजवादी पार्टी ने चुनावी प्रक्रिया और चुनाव आयोग को लेकर सवाल खड़े किए. यह स्थिति सपा के राजनीतिक रुख पर सवाल खड़े करती है. अगर ईवीएम की जगह बैलट पेपर से चुनाव कराने की मांग का आधार चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा कायम करना है, तो बैलट से हुए चुनाव के बाद भी असंतोष क्यों? चुनाव का तरीका बदलने के बावजूद शिकायतें जारी रहने से पार्टी की दलीलों पर सवाल उठना लाजिमी है. आखिर चुनावी व्यवस्था में ऐसा क्या है, जो सपा को स्वीकार नहीं हो रहा?
हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ने से नहीं बदलेगी तस्वीर
चुनाव आयोग पर सवाल उठाना किसी भी राजनीतिक दल का अधिकार है, लेकिन ऐसे आरोपों के साथ ठोस आधार भी जरूरी है. चुनावी नतीजे अनुकूल न होने पर पूरी प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा कर देना राजनीतिक जवाबदेही से बचने का रास्ता नहीं हो सकता. एमएलसी चुनाव के बाद सपा की ओर से उठाए गए सवालों ने एक बार फिर इसी बहस को जन्म दिया है.
अखिलेश यादव को यह समझना होगा कि चुनाव केवल आरोपों और दावों से नहीं जीते जाते. इसके लिए मजबूत संगठन, सक्रिय कार्यकर्ता और मतदाताओं के बीच लगातार संपर्क जरूरी है. अगर पार्टी को चुनावी नतीजों से शिकायत है, तो उसे अपनी तैयारियों और संगठन की भूमिका की भी समीक्षा करनी चाहिए. केवल चुनाव आयोग पर सवाल उठाने से पार्टी की चुनावी स्थिति नहीं बदलने वाली.
जमीनी कमजोरी से मुंह मोड़ने का बहाना तो नहीं?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी एक प्रमुख विपक्षी दल है. ऐसे में उससे अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी चुनावी रणनीति, संगठन और जनसंपर्क को मजबूत करे. लेकिन चुनावी नतीजों के बाद यदि बहस का केंद्र पार्टी की तैयारियों के बजाय चुनाव प्रक्रिया बन जाती है, तो संगठन की वास्तविक कमजोरियों पर चर्चा पीछे छूट जाती है.
एमएलसी चुनाव के नतीजे सपा के लिए आत्ममंथन का अवसर हैं. पार्टी को यह देखना चाहिए कि उसके उम्मीदवारों की तैयारी कैसी थी, कार्यकर्ताओं ने कितनी सक्रियता दिखाई और मतदाताओं के बीच उसका प्रभाव कितना रहा. इन सवालों के जवाब तलाशे बिना चुनावी हार के कारणों को समझना मुश्किल है.
2027 से पहले अखिलेश के सामने आत्ममंथन की चुनौती
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी के लिए यह समझना जरूरी है कि चुनावी राजनीति में केवल सत्ता पक्ष पर आरोप लगाकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता. विपक्ष की जिम्मेदारी सरकार और चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठाने के साथ-साथ अपनी कमियों को पहचानना भी है.
ईवीएम पर सवाल उठाने वाली सपा को बैलट पेपर से हुए चुनाव के बाद भी शिकायत है, तो पार्टी को अपने रुख और आरोपों के आधार पर स्पष्टता दिखानी होगी. चुनावी प्रक्रिया पर सवाल अपनी जगह हैं, लेकिन उन्हें जमीनी कमजोरी छिपाने का विकल्प नहीं बनाया जा सकता. अखिलेश यादव के सामने असली चुनौती चुनावी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि अपनी पार्टी को जमीन पर मजबूत करना है. आखिरकार, चुनाव का तरीका बदलने की मांग से ज्यादा जरूरी अपनी चुनावी तैयारी बदलना है.
(लेखक डॉ. अभय पाण्डेय, दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
