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Opinion: पहली बार किसी बड़े नेता ने अमर्यादित AI वीडियो का खुलकर किया समर्थन, अखिलेश ने आखिरी रेखा भी लांघी?

Opinion: इस लेख में अखिलेश यादव के AI के जरिए विपक्षी नेताओं के विवादित वीडियो बनवाने और इस्तेमाल करने की वकालत को राजनीतिक मर्यादा के नजरिए से सवालों के घेरे में रखा गया है.

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Opinion: राजनीति में विरोध होना स्वाभाविक है. नेता एक-दूसरे पर सवाल उठाते हैं, आरोप लगाते हैं और अपनी-अपनी विचारधारा के आधार पर विपक्ष को घेरते हैं. लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब राजनीतिक विरोध की भाषा और तरीका अपनी सीमाएं लांघने लगे. 

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का AI के जरिए विपक्षी नेताओं के विवादित और अमर्यादित वीडियो बनवाने की खुली वकालत करना इसी वजह से गंभीर सवाल खड़े करता है.

विरोध की राजनीति से व्यक्तिगत मजाक तक

विपक्षी नेताओं पर निशाना साधने के लिए भाषण देना एक बात है और किसी विपक्षी नेता की आपत्तिजनक तस्वीर या वीडियो बनवाकर उसे राजनीतिक मंच पर चलाना दूसरी बात. उससे भी आगे की बात तब हो जाती है, जब ऐसे कंटेंट को अपने नेताओं के साथ बैठकर देखा जाए, उस पर हंसी-मजाक किया जाए और फिर उसके निर्माण और इस्तेमाल को लेकर कोई संकोच भी न दिखे.

यही वह बिंदु है जहां सवाल सिर्फ एक वीडियो का नहीं रह जाता. सवाल उस राजनीतिक सोच का हो जाता है, जिसमें विरोधी को घेरने के लिए किसी भी तरह की सामग्री को राजनीतिक हथियार बनाने में कोई हिचक नहीं बची है.

खुद पार्टी का मुखिया इस स्तर पर आ जाए

नेता सोशल मीडिया पर विपक्ष के खिलाफ पोस्ट करते रहे हैं. राजनीतिक दल लंबे समय से एक-दूसरे के खिलाफ अभियान चलाते रहे हैं. लेकिन किसी बड़े राजनीतिक दल के मुखिया का खुद AI से विवादित सामग्री बनवाने और उसे राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल करने की खुली वकालत करना एक अलग स्तर की राजनीति को जन्म देता है. यह सिर्फ तकनीक का इस्तेमाल नहीं है, बल्कि तकनीक के जरिए राजनीतिक मर्यादा की सीमा को आगे धकेलने की कोशिश भी दिखाई देती है.

AI एक तकनीक है. उसका इस्तेमाल रचनात्मक काम से लेकर राजनीतिक संवाद तक, कई स्तरों पर हो सकता है. लेकिन जब इसी तकनीक का इस्तेमाल किसी विरोधी की छवि बिगाड़ने, उसका मजाक उड़ाने या उसे अमर्यादित तरीके से पेश करने के लिए किया जाने लगे तो सवाल उठना तय है कि राजनीति आखिर किस दिशा में जा रही है?

सपा का सोशल मीडिया कल्चर पहले भी सवालों में रहा है

अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी से जुड़े सोशल मीडिया कल्चर को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं. सपा मीडिया सेल की भाषा कई बार राजनीतिक बहस की मर्यादा से बाहर जाती रही है. सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों तक पहुंचती भाषा ने यह सवाल पहले भी खड़ा किया है कि क्या राजनीतिक विरोध के लिए कोई सीमा तय होनी चाहिए या नहीं.

अब AI के दौर में वही राजनीतिक संस्कृति एक नए रूप में सामने आती दिखाई दे रही है. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले शब्दों और पोस्ट के जरिए हमला होता था, अब तकनीक के सहारे तस्वीर और वीडियो भी राजनीतिक हथियार बनाए जा सकते हैं. या उससे भी बड़ा सवाल ये है कि अखिलेश यादव अब सार्वजनिक रूप से इसको प्रमोट कर रहे हैं.

शीर्ष नेतृत्व ही रास्ता दिखाएगा तो कार्यकर्ता क्या सीखेंगे?

यहीं अखिलेश यादव की राजनीति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. अगर किसी पार्टी का मुखिया ही किसी सार्वजनिक मंच पर बैठकर इस तरह के वीडियो बनवाएगा और नेताओं पर अभद्र टिप्पणी करेगा तो फिर भला कार्यकर्ता क्या सीखेंगे. वो भला क्या राजनीतिक मर्यादा अपनाएंगे. इससे भी आगे अखिलेश जिसका अपमान कर रहे हैं वो एक राज्य के सीएम हैं. अगर यही आचरण आगे भी जारी रहता है तो फिर पदों की क्या गरिमा बचेगी.

नई तकनीक के साथ नई मर्यादा की जरूरत

AI राजनीति का नया हथियार जरूर बन सकता है, लेकिन उसे विरोधी की गरिमा खत्म करने का हथियार बना देना राजनीति को आधुनिक नहीं, बल्कि और ज्यादा गिरा हुआ बनाता है. अखिलेश यादव को यह तय करना होगा कि उन्हें राजनीति को नई तकनीक देनी है या नई गिरावट. क्योंकि विपक्ष से लड़ाई कितनी भी तीखी हो, लोकतंत्र में मर्यादा की आखिरी सीमा मिटा देना किसी भी नेता के लिए राजनीतिक उपलब्धि नहीं हो सकती.

ये सवाल इसलिए अखिलेश पर सबसे ज्यादा है क्योंकि अखिलेश शायद भारतीय राजनीति के पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने खुले मंच से इस तरह की अमर्यादित वीडियो को प्रमोट किया है.

(लेखक डॉ. अभय पाण्डेय दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)