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Opinion: अपराधियों के लिए खौफ, तो जरूरतमंद का सहारा बनी यूपी पुलिस... अब तक 4 हजार से ज्यादा लोगों की बचाई जान

योगी सरकार में यूपी पुलिस का एक संवेदनशील चेहरा भी सामने आया है. 1 जनवरी 2023 से 10 अक्टूबर 2026 के बीच पुलिस ने सोशल मीडिया पर आत्महत्या का संकेत देने वाले 4 हजार से अधिक लोगों तक समय रहते पहुंचकर उनकी जान बचाने में मदद की है. फेसबुक और इंस्टाग्राम पर मिलने वाले अलर्ट के आधार पर पुलिस टीमें तुरंत मौके पर पहुंचती हैं.

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UP Police Allowance Hike
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Opinion: पुलिस का नाम आते ही आंखों के सामने एक सख्त चेहरा उभरता है, जो अनुशासित है, रौबदार है और अपने कर्तव्य के प्रति अडिग है. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के कार्यकाल में पुलिस का यह कठोर रूप अपराधियों के लिए खौफ का दूसरा नाम बन चुका है. कानून से खिलवाड़ करने वाले जानते हैं कि अब बचकर निकलने की राहें पहले जैसी आसान नहीं रह गई हैं. लेकिन इसी वर्दी के भीतर एक ऐसा दिल भी धड़कता है, जो चुपचाप अपना काम करता है. वह सुर्खियों में भले ही कम आता हो, लेकिन समाज के लिए उसका महत्व कहीं अधिक है.

कभी किसी पुल की रेलिंग पर, कभी रेलवे ट्रैक के किनारे, तो कभी घर की बंद दीवारों के पीछे, जब कोई इंसान जिंदगी से हार मान चुका होता है, तब महज एक संदेश मिलने पर कुछ पुलिसकर्मी बिना एक पल गंवाए उसकी मदद के लिए दौड़ पड़ते हैं. वे डांटते नहीं, सुनते हैं. वे आदेश नहीं देते, बल्कि हाथ थामते हैं. उस क्षण वही वर्दी, जिससे अपराधी कांपते हैं, टूटते हुए मन के लिए भरोसे का दूसरा नाम बन जाती है.

एक ओर कर्तव्य की कठोरता, दूसरी ओर करुणा की कोमलता. चरित्र का यही सम्मिश्रण योगी सरकार में पुलिस को केवल कानून का ही नहीं, जीवन का भी प्रहरी बनाता है. एक दशक पहले तक स्थिति यह थी कि पुलिस का नाम सुनते ही आम आदमी के मन में एक अजीब-सी झिझक और डर पैदा हो जाता था. थाने की चौखट पार करना किसी इम्तिहान से कम नहीं लगता था और वर्दी का जिक्र होते ही कानून का डंडा, पूछताछ की सख्ती और कार्रवाई की कठोरता याद आती थी. लेकिन समय के साथ पुलिस ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा के अनुरूप अपनी कार्यशैली और छवि में बदलाव किया. जो पुलिस माफिया और अपराधियों के लिए काल बनी, वही अवसाद से जूझ रहे और दुखों से परेशान लोगों के लिए सहारा भी बनी.

एक जनवरी 2023 से 10 अक्टूबर 2026 के बीच यूपी पुलिस ने सोशल मीडिया पर आत्महत्या का संकेत देने वाले चार हजार से अधिक लोगों तक समय रहते पहुंचकर उन्हें मौत के मुहाने से वापस लौटा लिया. जिंदगी की राह पर दोबारा लौटे ऐसे हर व्यक्ति के पीछे एक परिवार है, जहां कोई मां आज अपने बेटे को खाना परोस रही है, कोई पिता अपने बच्चे के सिर पर हाथ फेर रहा है, तो कोई पत्नी अपने जीवनसाथी की राह देख रही है.

आत्महत्या का विचार अक्सर किसी एक क्षण में पैदा नहीं होता. जो व्यक्ति भीतर से टूट रहा होता है, वह कई बार किसी से अपनी पीड़ा साझा नहीं कर पाता, लेकिन उसके मन में कहीं न कहीं यह उम्मीद भी बनी रहती है कि कोई उसे देख ले, कोई उसे समझ ले. आज के दौर में यह पुकार अक्सर सोशल मीडिया की स्क्रीन पर उभरती है, किसी पोस्ट, वीडियो या अधूरे वाक्य के रूप में.

वर्ष 2022 से यूपी पुलिस और मेटा कंपनी के बीच जारी समन्वय के तहत, जब फेसबुक या इंस्टाग्राम पर आत्महत्या से जुड़ी कोई पोस्ट सामने आती है, तो कंपनी पुलिस मुख्यालय के सोशल मीडिया सेंटर को ई-मेल और फोन के माध्यम से अलर्ट भेजती है. अलर्ट मिलते ही स्थानीय थाने की पुलिस टीम कुछ ही मिनटों में उस दरवाजे पर पहुंच जाती है, जिसके पीछे कोई व्यक्ति जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा होता है.

यहां तकनीक साधन है, साध्य नहीं. मशीन अलर्ट भेज सकती है, लेकिन किसी को यह भरोसा दिलाना कि वह अकेला नहीं है, यह काम संवेदनशील हृदय रखने वाला व्यक्ति ही कर सकता है. यही संवेदनशीलता अब यूपी पुलिस की विशिष्ट पहचान के रूप में उभर रही है.

लखनऊ के सआदतगंज की घटना इसका उदाहरण है. छब्बीस वर्ष का एक डिलीवरी बॉय दिनभर दूसरों के दरवाजों तक उनकी जरूरत का सामान पहुंचाता था. लेकिन पत्नी और ससुराल पक्ष के साथ विवाद के बोझ तले वह इस कदर टूट गया कि उसने इंस्टाग्राम पर आत्महत्या से जुड़ा एक वीडियो पोस्ट कर दिया. नदी के किनारे खड़ा वह युवक शायद उस समय अपनी जिंदगी का आखिरी फैसला लेने की कगार पर था.

मेटा से अलर्ट मिला, मुख्यालय ने उसकी लोकेशन का पता लगाया और थाने की टीम करीब दस मिनट में उस तक पहुंच गई. ये दस मिनट एक जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी थे. पुलिस ने न केवल उसे नदी से दूर किया, बल्कि बाद में उसकी काउंसलिंग भी कराई और परिजनों को भी उसकी मदद की इस प्रक्रिया से जोड़ा. यही वह बारीक फर्क है, जो कर्तव्य और संवेदना के बीच की रेखा को स्पष्ट करता है. कर्तव्य जान बचा लेता है, जबकि संवेदना जीने की वजह लौटाती है.

गाजियाबाद के लिंक रोड की कहानी भी कम मार्मिक नहीं है. चौबीस साल का एक युवक घर का खर्च नहीं उठा पाने के कारण पैदा हुई आर्थिक तंगी से इतना हताश हो गया कि उसने अपनी जान लेने की तैयारी कर ली और इससे जुड़ा संदेश सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया. पुलिस टीम महज आठ मिनट में उसके घर पहुंच गई, जहां कमरे में फंदा लटका हुआ था. एक पल की भी देरी होती, तो शायद एक परिवार का चिराग बुझ चुका होता. पुलिस ने युवक को यह हौसला दिया कि जीवन की मुश्किलें स्थायी नहीं होतीं और उनसे निकलने के रास्ते तलाशे जा सकते हैं.

इन दोनों घटनाओं में समय सबसे महत्वपूर्ण इकाई के रूप में सामने आता है. आठ मिनट और दस मिनट. ये आंकड़े उस तत्परता की गवाही देते हैं, जो तब पैदा होती है जब व्यवस्था यह मानकर चलती है कि हर जान कीमती है. इसका श्रेय उस सोच को भी जाता है, जो नेतृत्व के स्तर पर तय होती है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में तकनीक आधारित पुलिसिंग और त्वरित कार्रवाई पर जोर दिया गया है. मेटा की अलर्ट व्यवस्था इसी दिशा में एक सार्थक कड़ी है.

इस पूरे प्रसंग में उन अनाम पुलिसकर्मियों को भी याद किया जाना चाहिए, जो सोशल मीडिया सेंटर में बैठकर लगातार अलर्ट पर नजर रखते हैं और सूचना मिलते ही मदद के लिए रवाना हो जाते हैं. उनकी तत्परता, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी कई परिवारों को अपनों से बिछड़ने के असहनीय दर्द से बचा रही है.

ऐसे मामलों में समाज के रूप में हम सभी की भी एक जिम्मेदारी है. अगर किसी दोस्त, रिश्तेदार या सहकर्मी की बातों में निराशा झलके, कोई अचानक चुप रहने लगे या सोशल मीडिया पर उसकी पोस्ट में जिंदगी से थकान दिखाई दे, तो उसे अनदेखा न करें. एक फोन कॉल, एक मुलाकात या सहज बातचीत कई बार वह काम कर सकती है, जो बड़ी से बड़ी व्यवस्था भी नहीं कर पाती. पुलिस और तकनीक अंतिम सुरक्षा कवच हैं, लेकिन पहला कवच हमारा अपनापन है.

आज, जब दुनिया भर में यह सवाल उठता है कि तकनीक कहीं इंसान को इंसान से दूर तो नहीं कर रही, तब यूपी पुलिस की यह पहल एक आश्वस्त करने वाला उदाहरण प्रस्तुत करती है. यह बताती है कि तकनीक अगर संवेदना के हाथों में हो, तो वह दूरियां बढ़ाने के बजाय उन्हें मिटा भी सकती है.

(लेखक, रतन कुमार श्रीवास्तव, पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)