संभल की सनसनीखेज रिपोर्ट में हिंदू आबादी घटने का कड़वा सच! 76 साल के सतीश गर्ग ने सुनाई 1978 की हॉरर स्टोरी
संभल दंगों की जांच रिपोर्ट में जनसंख्या बदलाव, हिंदू पलायन और बार-बार हुई सांप्रदायिक हिंसा का खुलासा हुआ है. सतीश चंद्र गर्ग ने 1978 के दंगों की भयावह यादें साझा कीं और आज भी जारी असुरक्षा पर चिंता जताई.
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Sambhal Riots Report: संभल जिले में समय-समय पर हुई सांप्रदायिक हिंसा और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर बनी विशेष जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी है. इस रिपोर्ट में बीते कई दशकों में जिले में हुई जनसंख्या संरचना में बड़े बदलाव और उससे उपजे सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का विस्तार से उल्लेख किया गया है. साथ ही नवंबर 2024 की हिंसा को एक निर्णायक मोड़ बताते हुए प्रशासनिक विफलताओं और राजनीतिक तुष्टिकरण की कड़ी आलोचना की गई है. बता दें की रिपोर्ट में हिंदू समाज के बड़े पैमाने पर पलायन की गंभीर तस्वीर सामने आई है. इसमें 76 वर्षीय सतीश चंद्र गर्ग जैसे प्रत्यक्षदर्शियों के बयान शामिल हैं, जिन्होंने बताया कि 1978 के दंगों में उनकी फैक्ट्री जला दी गई, नौ मजदूरों की हत्या हुई और लाखों का नुकसान हुआ. उन्होंने कहा कि बार-बार की हिंसा, प्रशासन की निष्क्रियता और असुरक्षा के माहौल ने उन्हें संभल छोड़ने पर मजबूर कर दिया.
जनसांख्यिकी में भारी बदलाव
जांच समिति की रिपोर्ट के अनुसार आजादी के समय संभल में हिंदू आबादी करीब 45% थी, जो अब घटकर 15-20% के बीच रह गई है. दूसरी ओर, मुस्लिम आबादी अब 80% से अधिक हो चुकी है. रिपोर्ट में इसे “संवेदनशील जनसांख्यिकीय असंतुलन” बताया गया है, जो कई सामाजिक और सांप्रदायिक तनावों का कारण बना.
पलायन के पीछे असुरक्षा और हिंसा मुख्य कारण
रिपोर्ट में लिखा गया है कि बीते दशकों में क्षेत्र में बार-बार दंगे हुए, जिससे हिंदू समाज में असुरक्षा की भावना गहरी होती गई. खासकर नवंबर 2024 में हुई सांप्रदायिक हिंसा को एक निर्णायक बिंदु बताया गया है, जिसमें पुलिस की निष्क्रियता और कुछ नेताओं के भड़काऊ भाषणों की भी आलोचना की गई है. इन हालातों के चलते हजारों हिंदू परिवारों ने संभल छोड़ने का फैसला किया.
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प्रत्यक्षदर्शियों ने क्या कहा?
76 वर्षीय सतीश चंद्र गर्ग अब संभल से पलायन कर चुके हैं. उन्होंने उस भयावह दौर की यादें साझा कीं. उन्होंने बताया की “सन 78 के दंगे में हमारी फैक्ट्री में काम करने वाले नौ लोगों को जिंदा जला दिया गया था। कई लोगों को सड़क पर ही मार डाला गया. हमारी फैक्ट्री को जला दिया गया, और उस वक़्त जो माल रखा था, लूट लिया गया. उस समय जनता पार्टी की सरकार थी लेकिन प्रशासन ने कोई मदद नहीं की.” उन्होंने बताया कि उनका उस समय करीब 30 लाख रुपए का नुकसान हुआ था जो आज के हिसाब से करोड़ों में होता.
उन्होंने आगे बताया कि “हमारे इलाके में हिंदू रहते थे, लेकिन हर बार दंगे होते थे” सतीश गर्ग ने आगे बताया कि जिस इलाके में वे रहते थे वह हिंदू कोऑपरेटिव एरिया था, लेकिन वहां बार-बार दंगे होते थे और हर बार व्यापार और जीवन को नुकसान होता था. “मुस्लिम समाज के कुछ लोग जरूरत से ज्यादा उपद्रव करते थे, व्यापार धीरे-धीरे खत्म हो गया, लोग मारे जाते थे, और प्रशासन बिल्कुल मदद नहीं करता था.”
सतीश ने कहा कि “बार-बार के दंगों से मन टूट गया था, सुरक्षा का कोई इंतज़ाम नहीं था. ना व्यापार बचा, ना सुरक्षा रही. हमने सोचा कि अगर जिंदा रहना है तो संभल से निकलना ही पड़ेगा.” आपको बता दें कि पलायन के बाद उन्होंने एक नए शहर में मेडिकल स्टोर शुरू किया और संघर्ष के बाद दोबारा जीवन खड़ा किया.
उनका कहना है कि “आज भी संभल की हालत देखकर दिमाग खराब हो जाता है. अब भी जब संभल जाते हैं तो पहचान नहीं पाते कि ये वही शहर है जिसे हमने छोड़ा था. इतनी ज्यादा आबादी हो गई है, व्यापार लगभग खत्म हो गया है, और माहौल अब भी डरावना लगता है.”
योगी सरकार आने के बाद थोड़ी उम्मीद जगी है
सतीश चंद्र गर्ग ने कहा कि “योगी जी की सरकार आने के बाद लोगों में उम्मीद जगी है. लोगों को लगता है कि अब शायद कुछ सुधार हो वरना पहले तो यही सोचते थे कि किसी भी हालत में वहां से भागो.”
नवंबर 2024 की हिंसा को रिपोर्ट में बड़ा कारण बताया गया
बता दें कि रिपोर्ट में खासतौर पर नवंबर 2024 में हुए दंगे का जिक्र करते हुए बताया गया है कि कैसे इस घटना ने वहां की स्थिति को और बिगाड़ दिया. इसमें पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं और कुछ स्थानीय नेताओं के भड़काऊ भाषणों को जिम्मेदार ठहराया गया है.
रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें
संभल दंगों की जांच रिपोर्ट में राज्य सरकार को कई महत्वपूर्ण सिफारिशें दी गई हैं, जिनका उद्देश्य न केवल पलायन को रोकना है, बल्कि क्षेत्र में स्थायी शांति और सामाजिक संतुलन स्थापित करना भी है. रिपोर्ट के अनुसार, सबसे पहले पलायन की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए एक ठोस और दीर्घकालिक नीति बनाई जानी चाहिए, ताकि लोगों को अपने मूल स्थान पर सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन मिल सके.
इसके अलावा, दंगों से प्रभावित परिवारों को पुनर्वास की सुविधाएं देने करने के साथ-साथ आर्थिक सहायता भी दी जाए ताकि वे अपने जीवन को फिर से व्यवस्थित कर सकें. प्रशासनिक ढांचे की जवाबदेही बढ़ाने की आवश्यकता भी सामने रखी गई है, खासकर दंगों जैसे संवेदनशील समय में पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और निगरानी तंत्र लागू किए जाने की मांग की गई है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सांप्रदायिक तनाव को नियंत्रण में रखने के लिए सख्त कानूनी प्रावधानों का पालन सुनिश्चित किया जाए. इसमें भड़काऊ भाषण, अफवाह फैलाने और दंगे भड़काने वालों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई की सिफारिश की गई है, ताकि समाज में भय का माहौल न पनपे और सभी समुदायों के बीच विश्वास बहाल हो सके.
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