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आसमान में धान बोने वाला किसान...रमाशंकर 'विद्रोही', जिनकी कविताओं ने सभ्यताओं से मांगी जली हुईं लाशों का हिसाब

Ramashankar yadav vidrohi : 'विद्रोही' अपनी कविताओं में सीधा समाज से सवाल करते. उनकी कविताओं में सवाल, अकसर तर्क में बदल जाते और तर्क, एक जिद में. कविताओं में उनकी जिद ही उन्हें 'विद्रोही' बनाती.

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Ramashankar yadav vidrohi
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मैं किसान हूं, आसमान में धान बो रहा हूँ... रमाशंकर 'विद्रोही' पत्रकारिता का ककहरा सीखते वक्त पहली बार ये नाम सुना था. 'सहित्य की तरफ झुकाव' वाले वरदान के साथ छात्र, हिन्दी पत्रकारिता की पढ़ाई करने आते हैं. इसी वरदान के कारण ही भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में पहली बार 'विद्रोह' की कुछ पंक्तियां सुनी जो दिलों दिमाग पर असर कर गई. वो पंक्तियाँ थी -