उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी द्वारा घोषित 8 राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में जौनपुर के वरिष्ठ दलित नेता विद्यासागर सोनकर का नाम सबसे बड़े 'सरप्राइज' के रूप में सामने आया है. हरीश द्विवेदी, बृजलाल, स्मृति ईरानी, वरुण गांधी और संजीव बालियान जैसे दिग्गज नामों की अटकलों के बीच पार्टी ने जमीनी और निष्ठावान कार्यकर्ता विद्यासागर सोनकर पर दांव खेला है. 1985 में बूथ अध्यक्ष के रूप में अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले सोनकर को उच्च सदन भेजना बीजेपी की पूर्वांचल में 'दलित समीकरण' मजबूत करने और समाजवादी पार्टी (सपा) के 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) कार्ड का जवाब देने की बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
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बूथ अध्यक्ष से सांसद तक: 40 साल का समर्पित राजनीतिक सफर
विद्यासागर सोनकर का राजनीतिक सफर पूरी तरह से सांगठनिक निष्ठा और निष्पक्ष समर्पण की मिसाल रहा है.
संघ से जुड़ाव और शुरुआती कदम: गोरखपुर विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने वाले सोनकर शुरुआत से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े रहे. उन्होंने 1985 में भाजपा के बूथ अध्यक्ष के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की.
नगर निकाय से संसद तक: 1989 और 1994 में वे अपने वार्ड से भाजपा के टिकट पर सभासद चुने गए. इसके बाद 1996 में उन्होंने बड़ी सफलता हासिल की, जब वे सैदपुर (सुरक्षित) लोकसभा सीट (जो अब मछलीशहर के नाम से जानी जाती है) से सांसद चुने गए.
संगठन में अहम भूमिका: वे 2002 से 2003 तक जौनपुर भाजपा के जिलाध्यक्ष रहे. बाद में केशव प्रसाद मौर्य के प्रदेश अध्यक्षीय कार्यकाल में उन्हें प्रदेश महामंत्री का दायित्व सौंपा गया.
चुनावी हार के बाद भी पार्टी से अटूट वफादारी, मिला MLC और अब राज्यसभा का तोहफा
चुनावी राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखने के बावजूद विद्यासागर सोनकर संगठन के कार्यों में निरंतर डटे रहे. 2009 के लोकसभा चुनाव और 2012 व 2017 के विधानसभा चुनावों में पराजय का सामना करने के बाद भी वे पार्टी से मजबूती से जुड़े रहे. भाजपा ने उनकी निष्ठा का मान रखते हुए 2018 में उन्हें उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सदस्य (MLC) बनाया और अब एमएलसी कार्यकाल के बाद उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला किया है.
पूर्वांचल में 'PDA' की काट और खटीक-पासी वोट बैंक को साधने की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों और स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, विद्यासागर सोनकर का नाम आगे करने के पीछे आगामी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का सियासी गणित काम कर रहा है.
खटीक समाज की गोलबंदी: पूर्वांचल में खटीक और पासी समुदाय का बड़ा वोट बैंक है. हालिया लोकसभा चुनावों में जौनपुर की दोनों सीटें भाजपा के हाथ से निकल गई थीं और सपा के 'PDA' नारे के कारण दलित वोटों का झुकाव विपक्ष की तरफ देखा गया था.
सपा के प्रभाव को रोकने की कोशिश: मछलीशहर क्षेत्र में सपा की सांसद प्रिया सरोज और विधायक रागिनी सोनकर के मजबूत प्रभाव को देखते हुए विद्यासागर सोनकर का चेहरा खटीक समाज को भाजपा के पाले में दोबारा एकजुट करने में अहम भूमिका निभा सकता है.
जमीनी कार्यकर्ता को तरजीह देकर भाजपा ने न केवल जौनपुर और पूर्वांचल के सियासी समीकरणों को साधने का प्रयास किया है बल्कि कैडर के बीच भी यह संदेश दिया है कि निष्ठावान कार्यकर्ताओं का सम्मान हमेशा सर्वोपरि रहेगा.
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