पूर्वांचल की राजनीति में दशकों तक रसूख रखने वाले और 'ब्राह्मण बाहुबली' के नाम से चर्चित विजय मिश्रा के राजनीतिक सफर पर अब अदालत ने उम्रकैद की मुहर लगा दी है. साल 1980 के बहुचर्चित प्रकाश नारायण पांडेय हत्याकांड में 44 साल (कचहरी गोलीकांड के 27 साल बाद आए फैसले) के लंबे इंतजार के बाद अदालत ने विजय मिश्रा समेत तीन अन्य दोषियों को आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई है.
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1980 का वो खूनी मंजर और अदालती फैसला
यह पूरा मामला साल 1980 का है, जब कचहरी परिसर में सरेआम गोलीकांड हुआ था. इस वारदात में प्रकाश नारायण पांडेय की हत्या कर दी गई थी. लंबी कानूनी प्रक्रिया और गवाहों के बयानों के आधार पर अदालत ने विजय मिश्रा को इस जघन्य अपराध का दोषी पाया. इस सजा के साथ ही विजय मिश्रा के चार दशक लंबे राजनीतिक रसूख को बड़ा कानूनी झटका लगा है.
कांग्रेस से निषाद पार्टी तक का सियासी सफर
विजय मिश्रा की राजनीतिक यात्रा बेहद उतार-चढ़ाव भरी रही है:
- शुरुआत: उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कांग्रेस के साथ की थी.
- मुलायम के करीबी: 90 के दशक में विजय मिश्रा मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी बनकर उभरे. इसके बाद वे 2002, 2007 और 2012 में लगातार भदोही की ज्ञानपुर (विकासपुर) सीट से सपा के टिकट पर विधायक चुने गए.
- बगावत और जीत: 2017 में सपा ने उनका टिकट काट दिया, जिसके बाद उन्होंने निषाद पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ा और मोदी लहर के बावजूद अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे.
बाहुबली की छवि: कालीन व्यापार से अपराध तक
भदोही और आसपास के जिलों में विजय मिश्रा का कालीन और पेट्रोल पंप के व्यवसाय पर बड़ा नियंत्रण था. उनकी पहचान एक ऐसे बाहुबली की थी जिसका प्रशासनिक गलियारों में खौफ और सम्मान दोनों था. हालांकि, समय के साथ उन पर रंगदारी वसूली, जमीनों पर कब्जे और हत्या के दर्जनों गंभीर मामले दर्ज होते गए.
परिवार का सियासी भविष्य और कानूनी शिकंजा
फिलहाल विजय मिश्रा के परिवार के कई सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन खुद विजय मिश्रा पर कानून का शिकंजा कसता जा रहा है. उम्रकैद की इस सजा को उनके राजनीतिक करियर के 'पूर्णविराम' के तौर पर देखा जा रहा है. पूर्वांचल की राजनीति में यह फैसला उन बाहुबलियों के लिए एक बड़ा संदेश है जो दशकों तक सिस्टम पर भारी पड़ते रहे.
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