Madhogarh Vidhan Sabha 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई सीटें ऐसी हैं जो किसी एक पार्टी का गढ़ मानी जाती थीं. लेकिन वक्त के साथ वहां के सियासी समीकरण पूरी तरह बदल गए. ऐसी ही एक बेहद चर्चित विधानसभा सीट है बुंदेलखंड के जालौन जिले की माधवगढ़ सीट. ऐतिहासिक माधवगढ़ किले के लिए मशहूर यह सीट एक समय बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का अजेय किला हुआ करती थी. लेकिन पिछले दो चुनावों से यहां भारतीय जनता पार्टी का परचम लहरा रहा है.
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2017 और 2022 में बीजेपी के मूलचंद निरंजन ने यहां से लगातार जीत दर्ज की. लेकिन सवाल यह है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी यहां हैट्रिक लगा पाएगी या फिर सपा का 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण और स्थानीय मुद्दे बीजेपी के इस विजय रथ को रोक देंगे? यूपी Tak के खास शो 'यूपी किसका' में आज समझिए माधवगढ़ सीट का पूरा सियासी गणित.
बसपा के गढ़ से बीजेपी की 'हैट्रिक' की तैयारी तक का सफर
माधवगढ़ सीट का चुनावी इतिहास देखें तो 2002 से 2012 तक यहां बसपा का एकछत्र राज रहा. 2002 में बृजेंद्र प्रताप सिंह, 2007 में हरि ओम उपाध्याय और 2012 में संतराम कुशवाहा ने यहां से बसपा के टिकट पर जीत हासिल की थी. इस जीत का मुख्य आधार यहां का विशाल दलित वोट बैंक था.
हालांकि 2017 की लहर में बीजेपी के मूलचंद निरंजन ने यह सीट बसपा से छीन ली और 2022 में भी अपनी जीत दोहराई. बीजेपी की इस सेंधमारी की वजह गैर-यादव ओबीसी, अपर कास्ट और दलित वोटों का बीजेपी के पक्ष में शिफ्ट होना माना जाता है.
'डबल इंजन' और विकास के दम पर फिर जीत का दावा
बीजेपी विधायक मूलचंद निरंजन का दावा है कि पीएम नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पिछले 9 वर्षों में माधवगढ़ का चौमुखी विकास हुआ है. मुख्य मार्गों व संपर्क मार्गों का निर्माण, सिंचाई सुविधाएं, स्कूल और नदियों-नालों पर पुलों के निर्माण से जनता बेहद खुश है. 'सबका साथ, सबका विकास' के मंत्र के कारण 2027 में बीजेपी को 2017 और 2022 से भी अधिक वोट मिलने का विश्वास जताया जा रहा है.
सपा का 'पीडीए' दांव और लोकसभा चुनाव के बदले आंकड़े
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के लिए माधवगढ़ सीट हमेशा से कमजोर कड़ी रही है जहां पार्टी अक्सर तीसरे नंबर पर रहती थी. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों ने सपा के लिए नई उम्मीदें जगाई हैं. सपा नेताओं का कहना है कि 2022 के बाद से जमीनी स्तर पर किए गए काम का नतीजा यह रहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने माधवगढ़ विधानसभा क्षेत्र में पहली बार बढ़त बनाई और करीब 1,11,000 वोट हासिल किए. सपा को उम्मीद है कि 2027 में यह बढ़त विधानसभा जीत में तब्दील होगी.
माधवगढ़ का जातीय समीकरण
माधवगढ़ में कुल मिलाकर गैर-यादव ओबीसी, सवर्ण और दलित वोटों का समीकरण ही हार-जीत तय करता है. यहां का अनुमानित जातीय आंकड़ा इस प्रकार है.
दलित मतदाता: 1,12,000
कुशवाहा समुदाय: 70,000
क्षत्रिय, ब्राह्मण और मुस्लिम (प्रत्येक): 35,000-35,000
राठौर: 30,000
कोरी समुदाय: 25,000
कुर्मी: 14,000
यादव: 10,000
अन्य जातियां: 56,000
क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार और जमीनी मुद्दे?
स्थानीय पत्रकारों और विश्लेषकों के अनुसार, 2027 का चुनाव बेहद कांटे की टक्कर का होने वाला है.
एंटी-इंकम्बेंसी और प्रत्याशी बदलाव: अगर बीजेपी एंटी-इंकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) से बचना चाहती है तो उसे शायद अपना प्रत्याशी बदलना पड़े.
सवर्ण नाराजगी और यूजीसी मुद्दा: यूजीसी नीति और कुछ फैसलों को लेकर सवर्ण (विशेषकर जैन समाज व अन्य) वर्ग में स्थानीय स्तर पर नाराजगी की चर्चा है.
ओवैसी (AIMIM) का फैक्टर: असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी (AIMIM) भले ही सीट न निकाल पाए, लेकिन वह सपा-कांग्रेस गठबंधन के मुस्लिम वोटों में सेंध लगाकर सपा का खेल बिगाड़ सकती है.
योगी आदित्यनाथ का चेहरा: तमाम स्थानीय मुद्दों के बावजूद, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का चेहरा और उनकी लोकप्रियता आज भी बीजेपी का सबसे मजबूत किला बनी हुई है.
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