Mood kya hai Kannauj:सपा को कन्नौज में हराने के लिए BJP की क्या है तैयारी, पत्रकारों ने बता दिया

यूपी तक

01 Sep 2026 (अपडेटेड: 01 Sep 2026, 03:14 PM)

कन्नौज में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज है. तीनों सीटों पर बीजेपी का कब्जा है. लेकिन सपा की वापसी की चर्चा है. जानिए अखिलेश यादव के प्रभाव, विधायकों की चुनौतियों और स्थानीय मुद्दों से क्या बनेगा चुनावी समीकरण.

Mood kya hai  Kannauj

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Mood kya hai  Kannauj: उत्तर प्रदेश का कन्नौज जिला समाजवादियों का पारंपरिक गढ़ माना जाता रहा है. वर्तमान में राजनीतिक रूप से बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है. 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही जिले की तीनों विधानसभा सीटों-कन्नौज सदर, तिरवा और छिबरामू पर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. फिलहाल तीनों ही सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है. लेकिन आगामी चुनाव को लेकर जनता का मूड और जमीनी समीकरण क्या कहते हैं? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए यूपी Tak ने कन्नौज के वरिष्ठ पत्रकारों के साथ एक खास चर्चा की. पत्रकारों के मुताबिक इस बार मुकाबला सीधे तौर पर बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच कड़ा और कांटेदार होने वाला है.

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अखिलेश यादव का चेहरा सपा की सबसे बड़ी ताकत

पत्रकारों का मानना है कि कन्नौज सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का चेहरा समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है. कन्नौज में सपा का मतलब अखिलेश यादव से है. भले ही पिछले कुछ चुनावों में सपा का ग्राफ गिरा हो या 2022 में तीनों सीटें बीजेपी के पास चली गई हों. लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव की बड़ी जीत ने सपा कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है. सपा से जो भी प्रत्याशी मैदान में उतरेगा उसे अखिलेश यादव के चेहरे और उनके कार्यकाल में दी गई बड़ी विकास परियोजनाओं (जैसे मेडिकल कॉलेज, हृदय संस्थान आदि) का सीधा फायदा मिलेगा.

बीजेपी के तीनों मौजूदा विधायकों की छवि और चुनौतियां

जिले की तीनों सीटों पर मौजूदा बीजेपी विधायकों की व्यक्तिगत छवि और उनके कामकाज को लेकर पत्रकारों का मिला-जुला आकलन है. पूर्व आईपीएस अधिकारी और वर्तमान मंत्री असीम अरुण की कार्यशैली को अलग और स्वच्छ माना जाता है. उनके ऊपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है और वे सोशल मीडिया तथा अभियानों के जरिए जनता से लगातार जुड़ाव बनाए रखते हैं.

ऊर्जा राज्य मंत्री कैलाश राजपूत ने क्षेत्र में बायपास और सड़कों जैसे विकास कार्य कराए हैं. लेकिन जिले में बिजली की व्यवस्था और हालिया कुछ विवाद उनके लिए टफ टास्क खड़े कर सकते हैं.

कद्दावर नेता अर्चना पांडे ने चियासर पुल और रेलवे ओवरब्रिज जैसी परियोजनाओं को धरातल पर उतारा है. हालांकि स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और बिजली की समस्या उनके लिए चुनौती बन सकती है.

बुनियादी विकास के मुद्दे

पत्रकारों ने इस बात पर जोर दिया कि कन्नौज को इत्र, आलू और मक्के के लिए पूरे विश्व में पहचाना जाता है. लेकिन इसके बावजूद जिले में उच्च स्तर के अस्पतालों और बेहतर शिक्षा व्यवस्था की आज भी भारी कमी है. 2017 के बाद सपा सरकार के समय की कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं (जैसे कैंसर इंस्टीट्यूट और हृदय संस्थान) ठप या उपेक्षित पड़ी हैं. वहीं पिछले 5 वर्षों में बीजेपी सरकार द्वारा दी गई कई योजनाएं अभी केवल फाइलों या पाइपलाइन तक सीमित हैं. मतदाता वोट डालते समय इन बुनियादी सुविधाओं और विकास के मुद्दों को ध्यान में जरूर रखेगा.

गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार पर लगाम लेकिन एंटी-इंकंबेंसी का डर

बीजेपी सरकार के पक्ष में जो सबसे बड़ा फीडबैक पत्रकारों को मिलता है, वह है राज्य में गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार में आई कमी. शासन की कल्याणकारी योजनाओं (जैसे आवास योजना) से कई लाभार्थी खुश हैं. हालांकि 10 साल से लगातार सत्ता में रहने के कारण बीजेपी को सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) का सामना भी करना पड़ सकता है.

अंतिम निर्णय प्रत्याशियों के चेहरे और जातीय समीकरण पर टिका

वरिष्ठ पत्रकारों का निष्कर्ष है कि कन्नौज में इस बार मतदाता आसानी से अपने पत्ते नहीं खोल रहा है. बीएसपी और कांग्रेस का फिलहाल कोई बड़ा प्रभाव नजर नहीं आ रहा है. इसलिए असली लड़ाई बीजेपी और सपा के बीच ही होगी. दोनों ही पार्टियां जब अपने-अपने प्रत्याशियों की आधिकारिक घोषणा करेंगी तभी चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ हो पाएगी. प्रत्याशी का चयन और स्थानीय जातीय समीकरण ही 2027 के चुनाव में जीत-हार का मुख्य कारक बनेंगे.