Opinion: उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक तापमान भी बढ़ता जा रहा है. लेकिन सवाल सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी का नहीं है. सवाल यह है कि क्या सड़क पर टकराव, पुलिस से भिड़ंत और विवादों के जरिए ऐसा माहौल बनाने की कोशिश हो रही है, जिससे यह साबित किया जा सके कि यूपी में कानून-व्यवस्था ठीक नहीं है और राज्य में अराजकता का माहौल है?
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रायबरेली के फिरोज गांधी डिग्री कॉलेज में समाजवादी छात्र सभा और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं के बीच हुए विवाद के बाद यही सवाल खड़ा हुआ है. जिस तरह सपा नेताओं का पुलिस के साथ टकराव हुआ और पुलिस से बदसलूकी के आरोप सामने आए, उसने सिर्फ एक राजनीतिक दल के आचरण पर ही नहीं, बल्कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की मंशा पर भी सवाल खड़े किए.
हैरानी तब और बढ़ी, जब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने घटना के अगले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस पूरे मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाया. विपक्ष का सरकार से सवाल करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जिस तरह इस घटना को सपा के राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाया गया, उससे यह सवाल उठता है कि क्या ऐसे टकरावों को कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है?
सहारनपुर और गोंडा में भी उठे ऐसे ही सवाल
यह कोई पहला मामला नहीं है. इससे पहले सहारनपुर और गोंडा की घटनाओं में भी सपा की राजनीतिक प्रतिक्रिया सवालों के घेरे में रही है. इन घटनाओं को देखकर यह सवाल उठता है कि क्या सपा स्थानीय विवादों को राजनीतिक संघर्ष में बदलने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है?
रायबरेली की घटना पर भी अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के जरिए सरकार पर हमला किया और इसे PDA पर हमले के रूप में पेश किया. इसके बाद उन्होंने 24 सितंबर को PDA रथ के साथ रायबरेली जाने का ऐलान किया.
सहारनपुर में कानूनी कार्रवाई को धार्मिक रंग देने की कोशिश?
सहारनपुर की घटना का जिक्र भी जरूरी है. वहां एक अवैध निर्माण के खिलाफ अदालत के आदेश के बाद प्रशासन ने कार्रवाई की और निर्माण को गिराया गया. लेकिन सपा की ओर से इस मामले को धार्मिक रंग देने की कोशिश के आरोप लगे. इसे इस तरह पेश किया गया, जैसे पुलिस ने सिर्फ एक धार्मिक स्थल के खिलाफ कार्रवाई की हो. सपा ने अपना प्रतिनिधिमंडल भी भेजा.
इसी तरह सिंगर अंकित बालियान के मामले में भी अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया पर सवाल उठे. आरोप लगा कि घटना को जातीय रंग देने की कोशिश की गई. बाद में पुलिस कार्रवाई हुई तो उसी कार्रवाई और एनकाउंटर पर सवाल खड़े किए गए. यानी सवाल यह है कि यदि कार्रवाई न हो तो कानून-व्यवस्था पर सवाल, और कानून अपना काम करे तो कार्रवाई पर सवाल- सियासत का यह दोहरा पैमाना आखिर क्यों?
गोंडा में निषाद समाज के एक युवक की हत्या के मामले को भी सपा ने PDA से जोड़कर सरकार को घेरा. लेकिन बाद की जांच में हत्या में सपा कार्यकर्ताओं के शामिल होने की बात सामने आने के बाद राजनीतिक आरोपों की दिशा ही बदल गई.
अखिलेश क्यों दे रहे हैं इसे बढ़ावा?
पिछले कुछ दिनों की घटनाओं को देखें तो सवाल उठता है कि क्या सपा ऐसे मामलों को लगातार तूल देकर अराजकता का नैरेटिव खड़ा करना चाहती है? इससे भी गंभीर सवाल अखिलेश यादव की भूमिका पर है- आखिर वह ऐसे मामलों को राजनीतिक रूप से इतना महत्व क्यों दे रहे हैं?
दरअसल, कानून-व्यवस्था योगी सरकार की राजनीति का एक प्रमुख आधार रही है. ऐसे में विपक्ष के लिए स्वाभाविक है कि वह इसी मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश करे. लेकिन जब हर घटना को जातीय या धार्मिक रंग देकर बड़े राजनीतिक संघर्ष के रूप में पेश किया जाएगा, तो इससे राजनीतिक बहस मुद्दों के बजाय टकराव की ओर जाएगी.
(लेखक डॉ. सुनील कुमार मिश्र अतर्रा पी.जी. कॉलेज, बाँदा में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वे समसामयिक विषयों एवं सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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