Opinion: उत्तर प्रदेश की राजनीति में निषाद समाज के बदलते कद की कहानी सिर्फ चुनावी आंकड़ों की कहानी नहीं है. यह उस राजनीतिक बदलाव की कहानी भी है, जिसमें एक दौर में निषाद समाज के सामने पहचान का संकट था, उसकी बात सुनी नहीं जाती थी. सरकारें उनकी मांगों को कुचलने का काम करती थी. लेकिन आज उसी समाज की सत्ता में हिस्सेदारी भी है और उसकी विरासत को नई पहचान भी मिल रही है. इस बदलाव को समझने के लिए हमें अतीत और वर्तमान में हो रहे बदलावों को समझना होगा.
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जब आंदोलन कर रहे निषादों पर बरसाई गई गोलियां
2015 में अखिलेश यादव की सरकार के दौरान निषाद समाज आरक्षण की मांग को लेकर कसरवल में आंदोलन कर रहा था. लेकिन उनकी बात सुनना तो दूर निषाद समाज का आंदोलन उस समय की सपा सरकार को इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने गोली चलाने का आदेश दे दिया.
मौजूदा समय में योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री संजय निषाद आज भी उस घटना को अपने राजनीतिक संघर्ष का सबसे दर्दनाक अध्याय बताते हैं. वह कहते हैं कि कसरवल की लड़ाई में उन्होंने अपना एक भाई खोया. उसे अखिलेश यादव के इशारे पर गोली मार दी गई. आंदोलन के बाद निषाद समाज के लोगों पर कार्रवाई हुई और उन्हें अपराधी की तरह पेश किया गया.
नाम देखकर मुकदमे दर्ज किए गए
संजय निषाद सपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि कैसे अखिलेश राज में ट्रेनों में, सड़कों पर लोगों से नाम पूछा जाता था. निषाद समझते ही फर्जी मुकदमा लाद दिया जाता था. न जाने कितने लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया. वो कहते हैं कि हमारे हक को सपा सरकार में मारा गया. ये सपा की ही देन है कि आज निषाद समाज न नौकरी में है न उसकी विरासत को सम्मान मिला.
योगी सरकार में बदली तस्वीर
यहीं से उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखाई देता है. जिस संजय निषाद पर कसरवल आंदोलन के बाद मुकदमे दर्ज हुए थे, वही आज योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. उत्तर प्रदेश सरकार की आधिकारिक सूची में संजय निषाद को मत्स्य विभाग का कैबिनेट मंत्री दर्ज किया गया है. यह सिर्फ एक व्यक्ति के राजनीतिक सफर का बदलाव नहीं है. यह निषाद समाज की राजनीतिक हैसियत में आए बदलाव का संकेत है.
योगी सरकार ने सिर्फ प्रतिनिधित्व नहीं, विरासत को भी जगह दी
योगी सरकार की राजनीति में निषाद समाज की पहचान सिर्फ चुनाव और आरक्षण तक सीमित नहीं रही. निषादराज की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी सार्वजनिक पहचान देने की कोशिश हुई.
प्रयागराज का श्रृंगवेरपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. भगवान राम और निषादराज की मित्रता से जुड़े इस स्थल को विकसित करते हुए निषादराज पार्क और भव्य प्रतिमा का निर्माण किया गया. 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने श्रृंगवेरपुर में 579 करोड़ रुपये की 181 परियोजनाओं का लोकार्पण किया और निषादराज पार्क को भगवान राम और निषादराज की मित्रता का स्मारक बताया.
संजय निषाद भी इसे अपने समाज की पहचान से जोड़ते हैं. उनके मुताबिक श्रृंगवेरपुर में 51 फीट ऊंची निषादराज की प्रतिमा और पार्क बनाकर सरकार ने मछुआरा समाज को नई पहचान देने का काम किया है.
योगी के लिए निषादराज सिर्फ प्रतिमा नहीं, सामाजिक सम्मान का प्रतीक
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने भाषणों में राम और निषादराज के संबंध को सामाजिक समरसता और मित्रता के प्रतीक के तौर पर पेश करते हैं. श्रृंगवेरपुर में उन्होंने निषादराज की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और कहा कि निषादराज पार्क भगवान राम और निषादराज की मित्रता का भव्य स्मारक है.
यानी निषाद समाज को संबोधित करने की राजनीति भी बदली है. बात केवल वोट और आरक्षण तक नहीं है. बात यह भी है कि निषाद समाज की ऐतिहासिक भूमिका को सार्वजनिक पहचान मिले, उसकी विरासत को सम्मान मिले और उसका प्रतिनिधि सत्ता की निर्णय प्रक्रिया में मौजूद रहे. अयोध्या में भी निषाद समाज के महापुरुषों की कई प्रतिमाएं हैं. सड़क विस्तार के जरिए भी इस विरासत को जोड़ने का प्रयास हो रहा है.
सपा के लिए कसरवल, बीजेपी के लिए श्रृंगवेरपुर
यही वह राजनीतिक अंतर है जिसे निषाद समाज के नजरिए से देखा जाना चाहिए. सपा सरकार के दौर की निषाद राजनीति कसरवल के आंदोलन, गोली, मुकदमों और टकराव की याद से जुड़ी है. बीजेपी-योगी सरकार के दौर की तस्वीर निषाद पार्टी के सत्ता में प्रतिनिधित्व, संजय निषाद के कैबिनेट मंत्री बनने और श्रृंगवेरपुर में निषादराज की विरासत को सरकारी स्तर पर सम्मान मिलने से बनती है.
(लेखक, भूगोल विषय में पीएचडी हैं. चित्रकूट में वर्ष 2019 से 2024 तक दो कार्यकाल में जिला महामंत्री का दायित्व निभा चुके हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक विषयों में गहरी रुचि है.)
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