Opinion: कैबिनेट में महिलाओं को जगह देने में अखिलेश से बहुत आगे योगी, आधी आबादी को सत्ता में हिस्सेदारी देने का फर्क साफ

यूपी तक

• 03:59 PM • 14 Sep 2026

यूपी की राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ की सरकारों की तुलना चर्चा में है. महिला मंत्रियों की संख्या, सत्ता में हिस्सेदारी और महिला आरक्षण के मुद्दे पर दोनों सरकारों के रुख को आंकड़ों और राजनीतिक रिकॉर्ड के जरिए समझिए.

CM Yogi Adityanath

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Opinion: महिलाओं के अधिकार, सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात आज भारतीय राजनीति का बड़ा मुद्दा है. लेकिन जब इस बहस को सिर्फ भाषणों और नारों से निकालकर सत्ता में वास्तविक हिस्सेदारी के आंकड़ों पर देखा जाता है तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ की सरकारों के बीच एक बड़ा अंतर दिखाई देता है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन महिलाओं के अधिकार की बात कितनी जोर से करता है, सवाल यह है कि सत्ता में रहते हुए किसने महिलाओं को निर्णय लेने की जगह कितनी दी.

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अखिलेश सरकार में कैबिनेट में महिलाओं की मौजूदगी सीमित रही

अखिलेश यादव की 2012-17 की सरकार में महिला मंत्रियों की संख्या महज एक-दो तक सीमित रही. यानी पांच साल की सरकार में कैबिनेट और मंत्रिपरिषद के स्तर पर महिलाओं की भागीदारी बहुत सीमित रही. इसके मुकाबले योगी आदित्यनाथ की दोनों सरकारों में महिला प्रतिनिधित्व लगातार दिखाई दिया. 2017 में योगी सरकार ने पांच महिलाओं को मंत्रिपरिषद में जगह दी और 2022 के बाद भी महिला प्रतिनिधित्व को बनाए रखा बल्कि विस्तार किया.

यह अंतर महज संख्या का अंतर नहीं है. सत्ता में महिलाओं की मौजूदगी का सीधा मतलब है कि नीतियां बनाने और फैसले लेने की प्रक्रिया में आधी आबादी की आवाज कितनी मजबूती से मौजूद है.

योगी सरकार में बेबी रानी मौर्य जैसी महिला नेताओं को कैबिनेट स्तर की जिम्मेदारी मिलना भी इसी राजनीतिक संदेश का हिस्सा रहा कि महिलाओं को सत्ता के ऊंचे निर्णयकारी स्तर तक पहुंचाया जाए. इसके उलट अखिलेश सरकार के पूरे कार्यकाल में ऐसी मजबूत और निरंतर महिला कैबिनेट उपस्थिति दिखाई नहीं देती.

नारी शक्ति सिर्फ नारा नहीं, सत्ता में हिस्सेदारी भी है

योगी सरकार में महिलाओं की हिस्सेदारी कुल मंत्रिपरिषद का करीब 8-10 प्रतिशत रही. जबकि अखिलेश सरकार में यह लगभग 2-3 प्रतिशत के आसपास रही. बड़े राज्य की राजनीति में यह अंतर छोटा नहीं है. यह बताता है कि महिला सशक्तिकरण को सिर्फ चुनावी भाषण का विषय माना गया या सत्ता की संरचना में भी उसे जगह दी गई.

यही वजह है कि जब आज अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी महिलाओं के अधिकार और प्रतिनिधित्व की बात करते हैं, तो उनके अपने राजनीतिक रिकॉर्ड पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

महिला आरक्षण पर भी सियासत और सवाल

बीजेपी सरकार ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की दिशा में कानून बनाया. 2026 में इसके जल्द क्रियान्वयन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आया. लेकिन विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया. समाजवादी पार्टी ने भी इसका खुला विरोध किया.

सपा के भीतर महिला सम्मान पर भी सवाल

महिला सम्मान की बात करने वाली सपा के सामने उसके अपने संगठनात्मक व्यवहार को लेकर भी सवाल खड़े होते रहे हैं. सपा की महिला नेताओं को लगातार पार्टी में अपमान झेलना पड़ा है. इसका लंबा इतिहास है. आजम खान जैसे नेता अपनी पार्टी की महिला नेताओं का खुलकर अपमान किया. हाल में भी कई ऐसे मामले सामने आए जब सपा की महिला नेताओं के साथ उन्हीं के पार्टी के नेताओं ने अभद्रता की. यानी सवाल सिर्फ हिस्सेदारी का नहीं बल्कि सम्मान का भी है.

लेखक-डॉ. पतंजलि मिश्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों पर लिखते हैं. 
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)