Opinion: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजधर्म के लिए एक नीति वचन है- ‘प्रजा सुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्.’ अर्थात शासक का सुख जनता के सुख में और उसका हित जनता के हित में निहित है. राजधर्म के इस नीति वचन में आस्था रखनेवाला व्यक्ति ही बाढ़ जैसी आपदा में जनता के हितों के प्रति संवेदनशील हो सकता है. बाढ़ की तबाही लोगों के भीतर का भरोसा हिला देती है. बाढ़ का पानी जब खेतों की मेड़ों को तोड़ता हुआ गांव की गलियों और घरों में प्रवेश करता है तो उसके साथ भय भी प्रवेश करता है. आंखों के सामने जीवन भर की कमाई डूबती दिखाई देती है. पशुधन बह जाने का डर, बच्चों-बुजुर्गों की चिंता और अगले दिन की अनिश्चितता. पिछले कुछ दिनों से ऐसे ही संकट से जूझ रहे उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह का राजधर्म निभाया है, वह लोगों के लिए बड़ा संबल है. उन्होंने लखनऊ में बैठकर अधिकारियों से रिपोर्ट लेने के बजाय स्वयं मोर्चे पर पहुंचकर राहत और बचाव कार्यों की निगरानी की. लोगों ने अहसास किया कि आपदा की इस घड़ी में सरकार उनके साथ है.
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प्रदेश के कई जिलों में इस बार नदियों ने खतरे के निशान पार किए, गांव के गांव पानी में डूब गए और हजारों परिवार बेघर होने की कगार पर आ खड़े हुए. ऐसे समय में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं फ्रंट पर आकर राहत कार्यों की कमान संभाली. बाढ़ग्रस्त इलाकों के हवाई और जमीनी दौरे कर उन्होंने न केवल स्थिति का जायजा लिया, बल्कि अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि राहत में कोई कोताही बर्दाश्त नहीं होगी. नेतृत्वकर्ता की सक्रियता न सिर्फ अधिकारियों-कर्मचारियों का उत्साह बढ़ाती है, बल्कि उन्हें भी युद्धस्तर पर जुटने का प्रोत्साहन देती है. इसका प्रत्यक्ष परिणाम भी देखने को मिला, जब एनडीआरएफ व एसडीआरएफ की टीमों के साथ-साथ जिला प्रशासन के वरिष्ठ अफसर खुद लाइफ-जैकेट पहनकर पानी में उतरे और बचाव अभियानों का नेतृत्व किया. इस दृश्य के बहुत गहरे अर्थ इसलिए भी हैं क्योंकि एक दशक पहले तक ऐसी विषम आपदा को देख अधिकारियों के चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ जाती थी. बाढ़ राहत के नाम पर लूट-खसोट के अवसर दिखाई देते थे और तत्कालीन सरकारें भी मूक दर्शक बनी रहती थीं.
उत्तर प्रदेश में बाढ़ की विभीषिका के बावजूद सुखद व संतोषजनक तथ्य यह है कि अब तक एक भी जन या पशुहानि नहीं हुई. यह बाढ़ से निपटने व राहत कार्यों की सुनियोजित तैयारी का नतीजा है. राहत आयुक्त कार्यालय की ओर से जुलाई-अगस्त के दौरान 591 करोड़ से अधिक अलर्ट मैसेज भेजे गए, जिन्होंने लाखों लोगों को समय रहते मौसम और बाढ़ के संभावित खतरे से सचेत किया. यह अलर्ट सिस्टम सचमुच जीवनरक्षक साबित हुआ. लोगों को नदियों के जलस्तर और मौसम की चेतावनी समय पर मिलने से वे स्वयं भी सुरक्षित स्थानों की ओर बढ़ सके. यही वह दूरदर्शिता है, जो किसी भी आपदा प्रबंधन को सफल बनाती है. इसी कड़ी में 1070 हेल्पलाइन भी बड़ा सहारा बनकर उभरी. फंसे हुए लोगों की कॉल आते ही उनकी सटीक लोकेशन प्राप्त कर जिला प्रशासन और एनडीआरएफ-एसडीआरएफ की टीमों को तत्काल मौके पर भेजा गया. मौसम की हर चेतावनी पर सरकार की नजर बनी रही, जिससे प्रतिक्रिया का समय न्यूनतम रहा. इसी सतर्कता ने उत्तर प्रदेश को बाढ़ प्रबंधन के मामले में देश के लिए उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है.
आंकड़े जब मानव जीवन से जुड़ते हैं तो हर संख्या के पीछे एक चेहरा, एक परिवार और एक कहानी होती है. राहत अभियान के तहत सरकार ने अब तक करीब 20 हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है. यह आंकड़ा बताता है कि रेस्क्यू अभियान औपचारिकता भर नहीं रहा. इसे युद्धस्तर पर चलाया गया. प्रभावित परिवारों के भोजन की चिंता करते हुए सरकार ने अब तक छह लाख से अधिक लंच पैकेट और एक लाख से अधिक बाढ़ राहत किट वितरित की हैं. किसी बाढ़ग्रस्त परिवार के लिए भोजन और जरूरी सामग्री मिलना कितना बड़ा संबल होता है, यह वही समझ सकता है जो उस स्थिति से गुजरा हो. राहत केवल भोजन और आश्रय तक सीमित नहीं रही. बाढ़ के बाद सबसे बड़ा खतरा जलजनित बीमारियों का होता है, और सरकार ने इस पहलू पर भी गंभीरता दिखाई. लाखों क्लोरीन टैबलेट और ओआरएस पैकेट वितरित किए गए, ताकि दूषित पानी और डायरिया जैसी बीमारियों से लोगों को बचाया जा सके. प्रभावित जिलों में प्रभारी मंत्रियों की तैनाती कर उन्हें राहत सामग्री वितरण की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिससे मंत्री स्तर पर भी निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित हुई. यह पूरा तंत्र दिखाता है कि योगी सरकार ने आपदा को राजनीतिक नेतृत्व की प्राथमिकता के रूप में लिया है.
लोकतंत्र में हर संकट की घड़ी में जवाबदेही का पुनर्परीक्षण होता है. उत्तर प्रदेश की इस बाढ़ में सरकार ने जिस तरह अलर्ट सिस्टम, हेल्पलाइन, रेस्क्यू अभियान और राहत वितरण को एक साथ जोड़कर काम किया, वह प्रशासनिक स्तर पर संवेदनशील कार्यसंस्कृति पनपने की भी प्रमाण है. इस बार की बाढ़ ने यह संदेश दिया है कि सरकार, प्रशासन और तकनीक मिलकर काम करें, तो सबसे विकट प्राकृतिक आपदा में भी जनहानि को शून्य तक ले जाया जा सकता है.
(लेखक हरि मंगल, वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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