Opinion: राजनीतिक दलों की पहचान सिर्फ उनके नारों और बड़े नेताओं से नहीं होती. असली पहचान इस बात से बनती है कि पार्टी में कार्यकर्ता की कितनी अहमियत है, स्थानीय नेताओं की कितनी सुनी जाती है और फैसले किस प्रक्रिया से होते हैं. समाजवादी पार्टी के एमएलसी लाल बिहारी यादव का हालिया बयान इसी सवाल को फिर केंद्र में ले आया है.
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लाल बिहारी यादव ने कहा कि आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में अगर अखिलेश यादव किसी कुत्ते के गले में घंटी बांध दें, तो भी उसे वोट देना है. यह बयान शायद अखिलेश यादव के प्रति निष्ठा दिखाने के लिए दिया गया हो, लेकिन राजनीति में ऐसे शब्द पार्टी के भीतर की संस्कृति पर भी सवाल खड़े करते हैं.
सवाल सीधा है- क्या समाजवादी पार्टी में उम्मीदवार की स्वीकार्यता, स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय और संगठन की भूमिका से ऊपर सिर्फ एक व्यक्ति का फैसला है? अगर नहीं, तो फिर यह संदेश देने की जरूरत क्यों पड़ती है कि जिसे अखिलेश चुन दें, उसे बिना सवाल किए जिताना ही है?
नेता की अहमियत ठीक लेकिन संगठन का क्या?
यहीं से सपा की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा होता है. किसी भी पार्टी में शीर्ष नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन संगठन तभी मजबूत बनता है जब कार्यकर्ता की राय और स्थानीय परिस्थितियों को भी महत्व मिले. सपा में लंबे समय से पार्टी की राजनीति अखिलेश यादव के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई देती है. राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर उनका प्रभाव स्वाभाविक है, लेकिन जब यह संदेश जाने लगे कि उम्मीदवार कैसा भी हो, कार्यकर्ताओं को सिर्फ इसलिए उसे स्वीकार करना है क्योंकि फैसला अखिलेश ने किया है, तो संगठन की स्वतंत्र भूमिका पर सवाल उठना तय है.
यही वह जगह है, जहां बीजेपी और सपा के पार्टी कल्चर का फर्क दिखता है. बीजेपी में भी शीर्ष नेतृत्व मजबूत है, लेकिन फैसलों के पीछे संगठनात्मक प्रक्रिया और सामूहिक निर्णय की बात लगातार सामने रखी जाती है. पार्टी व्यक्ति से बड़ी दिखाई देने की कोशिश करती है. सपा के सामने चुनौती इसके उलट है- यह धारणा कि वहां पार्टी से बड़ा सिर्फ एक नाम है.
ये कार्यकर्ताओं का अपमान है
कार्यकर्ता सिर्फ झंडा उठाने और नारे लगाने के लिए नहीं होता. वही जमीन पर पार्टी का चेहरा होता है. उसे अपने क्षेत्र की जनता का मूड पता होता है और उम्मीदवार की स्वीकार्यता का भी अंदाजा होता है. लेकिन अगर उसकी भूमिका सिर्फ ऊपर से आए फैसले पर मुहर लगाने तक सीमित कर दी जाए, तो उसका मनोबल टूटता है. फिर कार्यकर्ता संगठन मजबूत करने से ज्यादा नेतृत्व को खुश करने की राजनीति में उलझने लगता है.
किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह खतरनाक स्थिति होती है. क्योंकि चुनाव प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया से नहीं, बूथ पर खड़े कार्यकर्ता की मेहनत से जीते जाते हैं.
जब सवाल पूछने की जगह सिर्फ ‘हां’ बच जाए
एक मजबूत संगठन में अनुशासन होता है, लेकिन संवाद भी होता है. नेतृत्व का सम्मान होता है, लेकिन कार्यकर्ता की भूमिका भी होती है. ‘घंटी’ वाला बयान इसी संतुलन पर सवाल खड़ा करता है. इसका राजनीतिक संदेश यही निकलता है कि सपा कार्यकर्ता की पहली जिम्मेदारी राय देना नहीं, बल्कि शीर्ष नेतृत्व के फैसले को बिना सवाल स्वीकार करना है.
यही किसी भी व्यक्ति केंद्रित राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी होती है. नेता पार्टी की ताकत जरूर हो सकता है, लेकिन जब पूरी राजनीतिक समझ और निर्णय प्रक्रिया एक ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटने लगे, तो संगठन धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है.
सहयोगियों से लेकर कार्यकर्ताओं तक, सम्मान का सवाल
इस पूरे मामले को अखिलेश यादव के उस ‘चवन्नी’ वाले बयान से अलग करके नहीं देखा जा सकता, जिसे लेकर राजनीतिक खींचतान हुई. गठबंधन की राजनीति में सहयोगियों के सम्मान की अपनी अहमियत होती है. एक गलत शब्द रिश्तों में दरार पैदा कर सकता है.
अब दूसरी तरफ पार्टी के भीतर से ऐसा बयान आता है, जिसमें कार्यकर्ताओं को यह संदेश दिया जाता है कि अखिलेश यादव जिसे चुन दें, उसे हर हाल में जिताना है. यहीं से सवाल उठता है कि क्या सपा की राजनीति में सहयोगियों के सम्मान और कार्यकर्ताओं की राय, दोनों के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है?
2027 से पहले सपा के सामने असली चुनौती
अखिलेश यादव के सामने 2027 की लड़ाई सिर्फ बीजेपी से नहीं है. उन्हें अपनी पार्टी का संगठन भी मजबूत रखना है, कार्यकर्ताओं का भरोसा बनाए रखना है और सहयोगियों के साथ राजनीतिक संबंधों को भी संभालना है. क्योंकि कोई भी पार्टी सिर्फ एक नेता के भरोसे चुनावी लड़ाई नहीं जीत सकती. जमीन पर संगठन चाहिए, समर्पित कार्यकर्ता चाहिए और ऐसा माहौल चाहिए, जिसमें कार्यकर्ता को लगे कि वह केवल आदेश मानने वाला नहीं, बल्कि पार्टी की राजनीतिक लड़ाई का साझेदार है.
लाल बिहारी यादव का बयान इसलिए मामूली नहीं है. उसने सपा के पार्टी कल्चर पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. 2027 से पहले सपा को इन सवालों का जवाब देना होगा. क्योंकि जिस पार्टी में कार्यकर्ता सिर्फ आदेश मानने वाला बन जाए, वहां संगठन की ताकत नहीं बढ़ती-वह धीरे-धीरे सिर्फ एक व्यक्ति की ताकत बनकर रह जाती है.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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