Opinion: किसी भी राजनीतिक दल के अध्यक्ष को जब भी जनता के सामने यह वादा करना हो कि सत्ता में आने पर वह अमुक काम करेगा तो सबसे पहले उसे खुद से यह सवाल पूछना चाहिए ‘क्या मैंने पहले सत्ता में रहते हुए अपने पुराने वादों को पूरा किया था?’ यह सवाल सामान्य राजनीतिक जवाबदेही का मामला है. लेकिन जब बात महिलाओं से जुड़े वादों की हो तो इसकी अहमियत और भी बढ़ जाती है. क्योंकि महिला-केंद्रित योजनाएं अक्सर समाज के सबसे कमजोर और जरूरतमंद वर्ग को सीधे प्रभावित करती हैं. ऐसे वादों को अधूरा छोड़ना केवल एक नीतिगत असफलता नहीं बल्कि लाखों परिवारों के भरोसे के साथ किया गया विश्वासघात भी माना जाता है.
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सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अब उत्तर प्रदेश की महिलाओं से एक नया और बड़ा वादा लेकर आए हैं कि उनकी सत्ता आई तो गरीब महिलाओं को 40 हजार रुपये देंगे. इस नए वादे को समझने से पहले जरूरी है कि हम उनके पुराने कार्यकाल में महिलाओं के नाम पर शुरू की गई योजनाओं और उनके अंजाम पर एक नजर डालें.
रानी लक्ष्मीबाई पेंशन योजना
2012 में सत्ता में आते ही अखिलेश सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई पेंशन योजना की शुरुआत की थी. इसका मकसद गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों में महिला मुखिया को हर महीने 400 रुपये की आर्थिक मदद देना था जो दो छमाही किस्तों में दी जानी थी. यह योजना अपने नाम से ही महिला-केंद्रित और सशक्तिकरण से जुड़ी दिखती थी. लेकिन महज दो साल के भीतर, 2014 में इसी सरकार ने इस योजना को बंद कर दिया और उसकी जगह समाजवादी पेंशन योजना ले आई. तर्क दिया गया कि नई योजना का दायरा बढ़ाकर करीब 40 लाख गरीब परिवारों तक पहुंचाया जाएगा. जबकि उस समय की रिपोर्टों के अनुसार रानी लक्ष्मीबाई पेंशन योजना से पहले ही करीब 25 लाख परिवार लाभान्वित हो रहे थे.सवाल उठता है कि जब योजना पहले से ही लाखों परिवारों तक पहुंच रही थी, तो उसे बीच में ही बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी?
दिलचस्प बात यह भी है कि रानी लक्ष्मीबाई पेंशन योजना खुद भी कोई मौलिक अवधारणा नहीं थी. यह पूर्ववर्ती मायावती सरकार की महामाया गरीब आर्थिक मदद योजना का ही नाम बदला हुआ स्वरूप थी. यानी सरकार बदलते ही योजनाओं के नाम बदलने और फिर कुछ ही समय में उन्हें भी बंद कर देने का यह सिलसिला उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से चला आ रहा है और अखिलेश सरकार भी इसी परंपरा का हिस्सा बनी. रानी लक्ष्मीबाई पेंशन योजना का यह अंजाम अपने आप में एक चेतावनी है कि महिलाओं के नाम पर बनी योजनाएं भी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से बदली या बंद की जा सकती हैं. लेकिन यह कोई अकेला उदाहरण नहीं था.
वादा आगे न बढ़ पायाः 'हमारी बेटी, उसका कल'
लेकिन यह महत्वाकांक्षी योजना ज्यादा दिन नहीं चल पाई.'हमारी बेटी, उसका कल' और उसके साथ शुरू हुई 'पढ़ें बेटियां, बढ़ें बेटियां' योजना केवल एक साल तक ही चल सकीं. यह तत्कालीन सरकार की प्राथमिकता और इच्छाशक्ति की कमी का उदाहरण है. करोड़ों रुपये के बजट और लाखों लाभार्थियों के लक्ष्य के बावजूद, योजना को अमल में लाने और उसे निरंतरता देने में सरकार गंभीर नहीं रही. बेटियों की शिक्षा और भविष्य से जुड़ा यह वादा सिर्फ शुरुआती एलान और आंकड़ों तक ही सीमित रह गया.
वादों की फेहरिस्त बनाम जमीनी हकीकत
यहां सवाल केवल दो योजनाओं का नहीं है बल्कि एक पैटर्न का है.अखिलेश यादव सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में महिला-केंद्रित योजनाओं की घोषणा तो जोर शोर से की. लेकिन उन्हें लंबे समय तक चलाने और उनका लाभ जमीनी स्तर पर पहुंचाने में लगातार नाकाम रही. चाहे वह रानी लक्ष्मीबाई पेंशन योजना हो या हमारी बेटी उसका कल, दोनों ही योजनाएं एक बड़े वादे के साथ शुरू हुईं और बिना किसी ठोस उपलब्धि के बीच रास्ते में ही दम तोड़ गईं. साफ है कि समाजवादी पार्टी अक्सर अपने कार्यकाल के दौरान लैपटॉप वितरण जैसी योजनाओं का हवाला देकर खुद को तकनीक और युवाओं का हितैषी बताती रही है. लेकिन जब बात दीर्घकालिक और संरचनात्मक योजनाओं की आती है तो रिकॉर्ड बताता है कि ऐसी योजनाएं अक्सर अल्पकालिक साबित हुईं.
फिर वही अंदाज, फिर वही वादे
अब जब उत्तर प्रदेश में चुनाव दिखाई दे रहा है तो अखिलेश यादव 'स्त्री सम्मान समृद्धि योजना' के जरिए गरीब महिलाओं को 40 हजार रुपये देने का वादा कर रहे हैं. साथ ही भविष्य में इंटर पास बेटियों को लैपटॉप देने और महिला सुरक्षा में किसी तरह का समझौता न करने का भरोसा भी दिला रहे हैं. यह वादा भी ठीक उसी अंदाज में सामने आया है जिस अंदाज में 2012 में रानी लक्ष्मीबाई पेंशन योजना और 'हमारी बेटी, उसका कल' का ऐलान हुआ था.बड़ी राशि, बड़ा लक्ष्य, और महिलाओं के प्रति गहरी संवेदनशीलता दिखाने वाला भाषण. लेकिन उनके नए वादों की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है. 40 हजार रुपये देने जैसा वादा वित्तीय रूप से कितना व्यावहारिक है, इसे किस बजट से पूरा किया जाएगा, और क्या यह योजना भी पिछली योजनाओं की तरह चुनाव बाद बदल दी जाएगी या बंद कर दी जाएगी. इन सवालों का कोई ठोस जवाब फिलहाल सामने नहीं है.
राजनीति में चुनाव से पहले लोकलुभावन वादे करना कोई नई बात नहीं है. लेकिन जब वादा करने वाले के पास सत्ता में रहते हुए अपने ही वादों को अधूरा छोड़ने का इतिहास हो तो जनता के सामने यह आकलन करना जरूरी हो जाता है कि क्या यह वास्तव में महिलाओं के हित में उठाया गया कदम है या फिर केवल एक और चुनावी स्टंट, जो वोट जुटाने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा. वैसे भी सपा का शासनकाल महिलाओं की असुरक्षा, उन पर हुए अत्याचार के लिए जाना जाता है. जबकि बेटियां घर से बाहर निकलते हुए भी डरती थीं. ऐसे में उन्हें कितना महिला हितैषी माना जाए, यह बड़ा सवाल है?
लेखक: अवनीश त्यागी, राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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