Opinion: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2024 का लोकसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़ी कामयाबी लेकर आया था. सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और दोनों दलों ने मिलकर बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ा. नतीजों में सपा 37 सीटों के साथ प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि कांग्रेस को 6 सीटें मिलीं. गठबंधन ने कुल 43 सीटें जीतीं. इस प्रदर्शन ने अखिलेश यादव के भीतर 2027 को लेकर एक बड़ा राजनीतिक भरोसा पैदा किया. लेकिन सवाल यह है कि क्या लोकसभा चुनाव में बना वही समीकरण विधानसभा चुनाव में भी उसी तरह काम करेगा?
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2027 की परिस्थितियां 2024 से काफी अलग हैं. लोकसभा चुनाव में मुद्दे अलग थे, सीटों का गणित अलग था और गठबंधन की जरूरत भी अलग थी. विधानसभा चुनाव में हर सीट पर स्थानीय संगठन, उम्मीदवार, जातीय समीकरण और बूथ स्तर की ताकत ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. ऐसे में 2024 की सफलता को 2027 का सीधा संकेत मान लेना सपा के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक भूल हो सकती है.
2024 का गठबंधन चला, लेकिन 2027 में सीटों पर ही टकराव
2024 में सपा और कांग्रेस ने अपेक्षाकृत आसानी से सीटों का बंटवारा कर लिया था. कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि सपा और उसके सहयोगियों ने बाकी सीटों पर चुनाव लड़ा. दोनों दलों ने एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारे और इसका फायदा उन्हें चुनाव में मिला.
लेकिन विधानसभा चुनाव में तस्वीर बदल चुकी है. कांग्रेस ज्यादा सीटों पर दावा कर रही है, जबकि सपा खुद को उत्तर प्रदेश का मुख्य विपक्षी दल मानती है. दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर खींचतान लगातार बढ़ रही है.
यह टकराव अब सिर्फ नेताओं के बयानों तक सीमित नहीं है. सहारनपुर में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और सपा विधायक आशु मलिक के बीच अधिकारियों के सामने हुई तीखी नोकझोंक ने दिखा दिया कि गठबंधन की दरारें अब जमीन पर भी दिखाई देने लगी हैं. अगर दो सहयोगी दलों के स्थानीय नेता सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे से भिड़ रहे हैं, तो सवाल स्वाभाविक है कि चुनाव के समय एक-दूसरे के उम्मीदवारों के लिए उनके कार्यकर्ता कितनी मजबूती से मैदान में उतरेंगे? यही 2027 की पहली और सबसे बड़ी चुनौती है.
लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक जैसा नहीं होता
अखिलेश यादव की 2024 की सफलता को समझने के लिए यह भी देखना होगा कि लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव का राजनीतिक गणित अलग होता है. लोकसभा चुनाव में मतदाता कई बार राष्ट्रीय मुद्दों और केंद्र की सरकार को ध्यान में रखकर मतदान करता है. विधानसभा चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, विधायक का चेहरा, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय मुद्दे और बूथ स्तर का संगठन कहीं ज्यादा निर्णायक हो जाता है.
लोकसभा के चुनाव में अक्सर बाहरी उम्मीदवार आकर किसी क्षेत्र में चुनाव लड़ते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनका विरोध नहीं होता, क्योंकि उनके मुद्दे अलग होते हैं. इसलिए नेताओं के साथ जनता का सीधा जुड़ाव उतना नहीं होता और न ही स्थानीय स्तर पर वैसी प्रतिस्पर्धा होती है. लेकिन विधानसभा में टिकटों को लेकर मारामारी होती है. हर नेता का जनता के साथ सीधे जुड़ाव और स्थानीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा होती है.
यही कारण है कि 2024 में एक साथ खड़े दिखाई देने वाले गठबंधन के भीतर 2027 आते-आते सीटों और स्थानीय प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ना स्वाभाविक है. इसका उदाहरण सपा नेताओं के बीच पश्चिमी यूपी में चल रही वर्चस्व की लड़ाई से भी समझा जा सकता है. 2024 में सपा-कांग्रेस के लिए सवाल था कि बीजेपी को कितनी सीटों पर रोका जाए. 2027 में सवाल यह है कि सत्ता की लड़ाई में कौन कितनी सीटों पर अपना दावा छोड़ेगा. यहीं से गठबंधन की असली परीक्षा शुरू होती है.
अखिलेश का ‘डर वाला नैरेटिव’ क्या फिर चलेगा?
2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने बीजेपी के खिलाफ संविधान, आरक्षण और लोकतंत्र को खतरे में बताने वाला नैरेटिव जोर-शोर से चलाया. ‘400 पार’ के नारे को आधार बनाकर यह संदेश दिया गया कि बीजेपी को बड़ी बहुमत मिलने पर संविधान और आरक्षण पर खतरा पैदा हो सकता है.
इस नैरेटिव का चुनावी असर दिखाई दिया और विपक्ष ने इसे अपनी बड़ी सफलता माना. लेकिन 2027 में वही नैरेटिव उसी ताकत के साथ काम करेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है.
2024 में जिस डर को लेकर मतदाता को लामबंद करने की कोशिश हुई थी, 2027 में उसके सामने राज्य सरकार के पांच साल का कामकाज, कानून-व्यवस्था, विकास योजनाएं और स्थानीय मुद्दे होंगे. मतदाता के सामने सवाल यह भी होगा कि विधानसभा चुनाव में वह अगले पांच साल के लिए किसे चुनना चाहता है.
यानी लोकसभा में केंद्र की राजनीति के खिलाफ बनाया गया नैरेटिव विधानसभा में उसी रूप में दोहराना आसान नहीं होगा.
PDA को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं
2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश के पीडीए का नारा भी खूब चला था. पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक को जोड़ने के लिए बनाए गए इस नारे का असर जमीन पर दिखा था. लेकिन अब इसी पीडीए को लेकर सबसे ज्यादा सवाल खड़े होने लगे हैं. खुद अखिलेश भी अब पीडीए को लेकर नारे बदलते रहे हैं. वहीं, गैर-यादव पिछड़ी जातियों, और दलितों की ओर से सबसे ज्यादा आरोप पीडीए पर ही खड़े हो रहे हैं. आरोप लग रहे हैं कि सपा के पीडीए में गैर-यादव पिछड़ों और दलितों की कोई इज्जत नहीं है.
सपा के सामने संगठन की भी बड़ी चुनौती
लोकसभा चुनाव में सपा का प्रदर्शन शानदार रहा. लेकिन विधानसभा चुनाव में हर सीट पर मुकाबला अलग होगा. 403 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय समीकरण, बूथ कमेटियां, कार्यकर्ताओं का तालमेल और सहयोगी दलों के साथ समन्वय- ये सभी चीजें चुनावी नतीजे तय करेंगी.
यहीं सपा-कांग्रेस का मौजूदा तनाव चिंता बढ़ाता है. अगर सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के कार्यकर्ता एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी मानने लगते हैं, तो गठबंधन का सबसे महत्वपूर्ण हथियार यानी *वोट ट्रांसफर* कमजोर पड़ सकता है.
2024 का फॉर्मूला 2027 में हूबहू नहीं दोहराया जा सकता
अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ा खतरा यही है कि वह 2024 के नतीजों को 2027 का राजनीतिक ब्लूप्रिंट मान लें. 2024 में सपा को कांग्रेस के साथ गठबंधन का फायदा मिला. लेकिन 2027 में वही गठबंधन सीट बंटवारे, नेतृत्व और स्थानीय संगठन के स्तर पर चुनौती बन रहा है. ऊपर से बीजेपी के पास सरकार का रिकॉर्ड और मजबूत संगठन है. ऐसे में 2024 की जीत को दोहराने के लिए सिर्फ पुराना गठबंधन और पुराना नैरेटिव पर्याप्त नहीं होगा.
(लेखक डॉ. अभय पाण्डेय दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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